उदयपुर में डॉ. मोहन भागवत बोले- हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की हुई थी विजय, इतिहास का सत्य आना चाहिए सामने

उदयपुर: वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती और ऐतिहासिक हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने (सार्द्ध चतुःशती समारोह) के अवसर पर झीलों की नगरी उदयपुर राष्ट्रभक्ति के रंग में रंगी नजर आई। बुधवार को शहर के गांधी ग्राउंड में प्रताप गौरव केन्द्र ‘राष्ट्रीय तीर्थ’ के तत्वावधान में एक विशाल ‘राष्ट्र चेतना संकल्प सभा’ का आयोजन किया गया। इस भव्य समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की और राष्ट्र रक्षा के लिए महाराणा प्रताप के अद्वितीय योगदान को याद किया।

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती

‘इतिहास स्वयं बताता है कि विजय किसकी हुई थी’

समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल दो सेनाओं का टकराव नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रचेतना और स्वाभिमान की रक्षा के लिए संपूर्ण समाज द्वारा लड़ा गया एक महासंग्राम था। उन्होंने इतिहास के पन्नों का जिक्र करते हुए कहा:

  • मुगल इतिहासकारों के वर्णन से भी यह स्पष्ट है कि युद्ध के विभिन्न चरणों में मुगल सेना को पीछे हटना पड़ा था।
  • महाराणा प्रताप की सेना के पहले ही आक्रमण ने विशाल मुगल फौज को मीलों पीछे धकेल दिया था।
  • युद्ध के बाद भी यदि शत्रु (अकबर की सेना) भय और असुरक्षा में रहा, तो वास्तविक विजय किसकी थी, यह इतिहास स्वयं तय करता है।
  • “दुनिया में कहीं अकबर की जयंती नहीं मनाई जाती, जबकि महाराणा प्रताप का स्मरण आज भी जन-जन करता है। इतिहास का यह लोकनिर्णय बताता है कि विजय किसकी हुई थी।”

सत्ता के लिए नहीं, धर्म और संस्कृति के लिए था संघर्ष

सरसंघचालक ने कहा कि महाराणा प्रताप को यूं ही ‘हिंदुआ सूरज’ नहीं कहा जाता। उनका पूरा जीवन केवल सत्ता प्राप्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि लोककल्याण, आदर्श शासन और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा का एक जीता-जागता उदाहरण था। उनकी सेना में केवल राजवंश या योद्धा वर्ग ही नहीं था, बल्कि जाति, पंथ और क्षेत्र के भेदों से ऊपर उठकर संपूर्ण समाज राष्ट्र रक्षा के लिए उनके साथ खड़ा था। उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति उसकी एकता, समरसता और आत्मविश्वास में निहित है और हमारा उत्थान ही विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा।

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती

शौर्य और भक्ति का संगम है मेवाड़: श्रीजी श्याम शरण

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित निम्बार्काचार्य श्रीजी श्याम शरण देवाचार्य जी ने कहा कि मेवाड़ की भूमि ने जहां प्रताप जैसे राष्ट्रनायक को जन्म दिया, वहीं मीराबाई जैसी महान कृष्णभक्त भी इसी धरा की देन हैं। उन्होंने कहा कि प्रताप ने “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” के आदर्श को चरितार्थ करते हुए अपना सर्वस्व मातृभूमि पर न्योछावर कर दिया। आज वर्षों से फैलाई गई भ्रांतियों का निराकरण हो रहा है और महाराणा का वास्तविक गौरव पुनः स्थापित किया जा रहा है।

हल्दीघाटी विजय का सत्य जन-जन तक पहुंचे

समारोह की अध्यक्षता करते हुए वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अध्यक्ष डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा ने कहा कि अब समय आ गया है कि समाज में प्रचारित भ्रांतियों को दूर कर हल्दीघाटी युद्ध के वास्तविक इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि महाराणा प्रताप ने मुगल सेना को बुरी तरह परास्त किया था।

कार्यक्रम के आरंभ में प्रताप गौरव केन्द्र के निदेशक अनुराग सक्सेना ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने बताया कि केंद्र में स्थापित श्रव्य-दृश्य प्रदर्शनी के माध्यम से हल्दीघाटी में प्रताप की हार के विमर्श को तोड़ा गया है और उनकी विजय के प्रामाणिक तथ्यों को स्थापित किया गया है। इस ऐतिहासिक आयोजन में मेवाड़ राजपरिवार के महाराणा विश्वराज सिंह मेवाड़ सहित कई प्रमुख संत-महंत और हजारों की संख्या में आमजन उपस्थित रहे।

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