राजस्थान परिवहन विभाग का अजब खेल: मलाईदार DTO पद छोड़ने को तैयार नहीं अफसर, प्रमोशन टालने के लिए जानबूझकर अटका रहे दस्तावेज

Madhu Manjhi

जयपुर। सरकारी महकमों में आमतौर पर हर अधिकारी और कर्मचारी जल्द से जल्द अपनी पदोन्नति (Promotion) चाहता है, लेकिन राजस्थान के परिवहन विभाग में एक बिल्कुल विपरीत और हैरान करने वाला ट्रेंड देखने को मिल रहा है। यहां जिला परिवहन अधिकारी (DTO) के पद पर तैनात अफसर प्रमोशन से दूर भाग रहे हैं। ‘मलाईदार’ मानी जाने वाली डीटीओ की कुर्सी और उसके प्रशासनिक रसूख को छोड़ने से बचने के लिए ये अफसर सिस्टम की खामियों का फायदा उठाते हुए ‘डेफर’ (स्थगित) खेल का सहारा ले रहे हैं।

ठंडी पोस्टिंग का डर और मलाईदार सीट का मोह

परिवहन विभाग की व्यवस्था के अनुसार, डीटीओ के पद से अगली पदोन्नति सहायक प्रादेशिक परिवहन अधिकारी (ARTO) के पद पर होती है। विभागीय कामकाज के लिहाज से एआरटीओ के पद को काफी ‘ठंडा’ और ‘डमी’ पोस्ट माना जाता है, जहां पब्लिक डीलिंग न के बराबर होती है।

इसके विपरीत, डीटीओ के पास वाहनों के रजिस्ट्रेशन, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने, टैक्स वसूली और प्रवर्तन (Enforcement) जैसे सीधे जनता से जुड़े अधिकार होते हैं। इसी पब्लिक डीलिंग, वित्तीय नियंत्रण और फील्ड की ताकत को बनाए रखने के लिए अफसर जानबूझकर एआरटीओ बनने से कतराते हैं।

कैसे खेला जाता है ‘डेफर’ का खेल?

प्रमोशन रोकने के लिए इन अफसरों द्वारा एक सोची-समझी रणनीति अपनाई जाती है:

  • दस्तावेजों में जानबूझकर देरी: डीपीसी (विभागीय पदोन्नति समिति) की बैठक से पहले हर अधिकारी को अपनी अचल संपत्ति का विवरण, संतान संबंधी घोषणा पत्र और वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR) जमा कराना अनिवार्य होता है। ये अफसर जानबूझकर ये दस्तावेज समय पर जमा नहीं कराते।
  • ‘डेफर’ श्रेणी का फायदा: जरूरी दस्तावेज न मिलने पर विभाग नियमों के तहत इन अधिकारियों के प्रमोशन को ‘डेफर’ (स्थगित) श्रेणी में डाल देता है, जिससे इनका प्रमोशन रुक जाता है और ये उसी डीटीओ पद पर काम करते रहते हैं।
  • चार्जशीट अटकाना: कुछ शातिर अफसर अपने खिलाफ लंबित मामूली चार्जशीट या पेनल्टी के मामलों का निस्तारण भी जानबूझकर नहीं करवाते हैं, ताकि पदोन्नति तकनीकी रूप से टलती रहे।

इन हथकंडों का फायदा यह होता है कि ये अफसर सालों-साल डीटीओ की सीट पर जमे रहते हैं और बीच के एआरटीओ पद को लांघकर बाद में सीधे आरटीओ (प्रादेशिक परिवहन अधिकारी) पद पर प्रमोट होने के इंतजार में रहते हैं।

वरिष्ठता सूची में शामिल हैं ये नाम

विभागीय वरिष्ठता सूची के दस्तावेजों के अनुसार, कम से कम पांच पात्र अफसर ऐसे हैं जो वर्तमान में एआरटीओ बनने की बजाय ‘डेफर’ होकर डीटीओ की सीट पर जमे हुए हैं। इस सूची में विनय बंसल, मक्खन लाल जांगिड़, दयाशंकर गुप्ता, समीर जैन और राधेश्याम शर्मा जैसे अधिकारियों के नाम शामिल हैं।

परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे बड़े सवाल

इस पूरे प्रकरण ने विभाग के उच्च स्तर की मॉनिटरिंग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

  1. कार्रवाई क्यों नहीं? जानबूझकर अनिवार्य दस्तावेज (ACR, संपत्ति विवरण आदि) समय पर जमा नहीं करने वाले अफसरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?
  2. समान पद पर क्यों रखा जाता है? डेफर श्रेणी में डाले गए अफसरों को उसी मलाईदार डीटीओ पद पर क्यों बनाए रखा जाता है, उन्हें हटाकर दूसरी जगह क्यों नहीं लगाया जाता?
  3. क्या उच्च स्तर पर मिलीभगत है? क्या आला अधिकारियों की मौन सहमति या मिलीभगत से ही यह पूरा डेफर सिस्टम विभाग में फल-फूल रहा है?

जिम्मेदार का बयान “डीपीसी प्रक्रिया में अगर इस तरह की दिक्कतें सामने आ रही हैं, तो उनका तुरंत समाधान करवाया जाएगा। कौनसे डीटीओ किस कारण से ‘डेफर’ श्रेणी में चल रहे हैं, इसकी विस्तृत जांच करवाई जाएगी और उचित कदम उठाए जाएंगे।” — भवानी सिंह देथा, अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS), परिवहन विभाग

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