लाख करोड़ के निवेश के बाद भी खाली हाथ? बाड़मेर-सांचौर बेसिन में तेल उत्पादन 75 हजार बैरल पर अटका

Madhu Manjhi

बाड़मेर। पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर-सांचौर बेसिन में साल 2017 से चल रही तेल खोज (Oil Exploration) मुहिम अब रेगिस्तान की भीषण गर्मी के बीच हांफने लगी है। पिछले सात साल के लंबे अंतराल और 100 से अधिक कुओं के खनन के बावजूद तेल कंपनियों के हाथ कोई बड़ी कामयाबी नहीं लगी है। जैसलमेर के डोंडेवाला में मिली गैस और सांचौर की ‘दुर्गा’ नामक छोटी तेल खोज को कंपनियां व्यावसायिक रूप से बहुत बड़ा नहीं मान रही हैं। ऐसे में पचपदरा (बालोतरा) रिफाइनरी के आत्मनिर्भर संचालन के लिए अब किसी बहुत बड़े तेल भंडार की खोज का इंतजार बेसब्री से किया जा रहा है।

बालोतरा रिफाइनरी की आत्मनिर्भरता के लिए 5.5 लाख बैरल क्रूड जरूरी

पचपदरा में 9 मिलियन टन सालाना क्षमता की अत्याधुनिक रिफाइनरी बनकर तैयार हुई है। हालांकि, तकनीकी रूप से इस रिफाइनरी में पूरा क्रूड ऑयल बाड़मेर-सांचौर बेसिन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि यहां का तेल बेहद गाढ़ा है। इसके लिए अरब देशों से आयातित हल्के तेल की मात्रा अधिक रखनी होगी।

इसके बावजूद, रिफाइनरी को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने और घरेलू आर्थिक संतुलन साधने के लिए इस बेसिन से प्रतिदिन कम से कम 5.5 लाख बैरल कच्चे तेल (Crude Oil) के उत्पादन की आवश्यकता है। इसके मुकाबले वर्तमान में यहां का कुल उत्पादन महज 75 हजार बैरल प्रतिदिन पर ही सिमट कर रह गया है।

1 लाख करोड़ का निवेश, लेकिन कोरोना और तकनीकी पेंच ने बिगाड़ा खेल

विवरण / मानकवर्तमान स्थिति एवं आंकड़े
प्रोजेक्ट पर कुल निवेश₹1,00,000 करोड़ से अधिक (2017 से अब तक)
कुल आवंटित ब्लॉक11 ब्लॉक (10 बाड़मेर-जैसलमेर और 1 बीकानेर में)
खोदे गए कुओं की संख्या100 से अधिक कुएं
वर्तमान तेल उत्पादन75,000 बैरल प्रतिदिन
रिफाइनेरी के लिए आवश्यक उत्पादन5,50,000 बैरल प्रतिदिन

साल 2017 में जब रिफाइनरी के कार्यशुभारंभ के साथ इन 11 ब्लॉकों में खोज शुरू हुई थी, तब उम्मीदें काफी ऊंची थीं। शुरुआती वर्षों में कोरोना महामारी के कारण काम बुरी तरह प्रभावित हुआ। हालांकि 2022 से खोज कार्य निरंतर जारी है, लेकिन सफलता अब भी कोसों दूर है।

मंगला, भाग्यम, ऐश्वर्या के बाद खालीपन; लगातार दोहन से घट रहा भंडार

चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि बाड़मेर के मुख्य भाग्य विधाता माने जाने वाले तीन बड़े तेल क्षेत्रों—मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या से पिछले कई वर्षों से लगातार कच्चे तेल का दोहन किया जा रहा है। वर्ष 2001 से लेकर वर्तमान वर्ष 2026 तक, लगभग ढाई दशकों के निरंतर दोहन ने इन मुख्य भंडारों के स्तर को काफी कम कर दिया है।

इसके अलावा, जो छोटे-छोटे तेल क्षेत्र तलाशे गए थे, अब उनसे भी तेल की आवक कम होने लगी है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि अगले कुछ समय में कोई बहुत बड़ा ‘ऑयल ब्लॉक’ नहीं खोजा गया, तो आने वाले दिनों में रिफाइनरी के लिए क्रूड ऑयल का एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

डीएनपी और बॉर्डर क्षेत्र में अनुमति का पेंच, ‘सरस्वती’ के पदचिह्नों पर उम्मीद

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, तेल खोज में जुटी प्रमुख कंपनियों ने डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) और भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकटवर्ती रणनीतिक इलाकों में तेल खोज के लिए सरकार से विशेष अनुमति मांगी है। लेकिन कड़े पर्यावरणीय नियमों और सुरक्षा कारणों के चलते अभी तक इसकी आधिकारिक स्वीकृति नहीं मिल पाई है। इस वजह से थार रेगिस्तान का एक बहुत बड़ा और संभावित रूप से समृद्ध इलाका तेल खोज से पूरी तरह वंचित है।

खोज एक प्रयास है और सफलता भाग्य:

भूवैज्ञानिकों और तेल विशेषज्ञों का एक धड़ा यह भी सुझाव दे रहा है कि यदि प्राचीन लुप्त सरस्वती नदी के पदचिह्नों (Paleochannels) को आधार मानकर नए सिरे से विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे और खोज की जाए, तो इस बेसिन में दोबारा बड़ी सफलता मिल सकती है। तेल की खोज एक सतत प्रयास है और इसकी सफलता काफी हद तक भौगोलिक भाग्य पर निर्भर करती है, इसलिए उम्मीदें अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

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