अश्वमेघ यज्ञ की भस्म से बनी है जयपुर के बाल गणेश की मूरत; नाहरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित है बेजोड़ मंदिर

Madhu Manjhi

गढ़ गणेश मंदिर में भगवान गणेश का वह स्वरूप है जो उनके शिशु काल का माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शिशु अवस्था में गणेश जी की सूंड नहीं थी, इसी बाल रूप को यहाँ सहेजकर रखा गया है। इस मंदिर का निर्माण जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था। मंदिर में दो प्रमुख विग्रह हैं—एक मदार (आंकड़े) की जड़ से निर्मित है और दूसरा अश्वमेघ यज्ञ की पवित्र भस्म से तैयार किया गया है, जो इसकी दिव्यता को कई गुना बढ़ा देता है।

365 सीढ़ियां और समय का चक्र

भक्तों के लिए यहाँ की चढ़ाई किसी साधना से कम नहीं है। मंदिर तक पहुँचने के लिए 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो साल के प्रत्येक दिन का प्रतीक मानी जाती हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि इन सीढ़ियों को चढ़ने के बाद बाल गणेश के दर्शन करने से पूरे साल के कष्ट दूर हो जाते हैं। चढ़ाई के बीच में एक प्राचीन शिव मंदिर भी है, जहाँ पूरे शिव परिवार का आशीर्वाद मिलता है।

राजसी ठाट और स्थापत्य का चमत्कार

इस मंदिर की बनावट में प्राचीन वास्तुकला और शाही परंपराओं का मेल दिखता है। मंदिर को नाहरगढ़ पहाड़ी पर ऐसे कोण पर बनाया गया है कि सिटी पैलेस के चन्द्र महल से इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। पुराने समय में जयपुर के महाराजा अपने दिन की शुरुआत चन्द्र महल से दूरबीन द्वारा गढ़ गणेश के दर्शन करके ही करते थे। यह राजा की अपने आराध्य के प्रति अटूट आस्था का प्रमाण था।

मनोकामना पूर्ण करते हैं ‘कान’ में बोले गए शब्द

मंदिर परिसर में पत्थर के बने दो विशाल मूषक (चूहे) स्थापित हैं। यहाँ आने वाले भक्त इन मूषकों के कान में अपनी गुप्त मनोकामनाएं कहते हैं। लोक मान्यता है कि मूषक ये संदेश सीधे बाल गणेश तक पहुँचाते हैं और भक्त की झोली भर जाती है।

मंदिर में फोटोग्राफी प्रतिबंधित है, ताकि वहाँ की शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा बनी रहे। हालांकि, मंदिर की ऊंचाई से दिखने वाला जयपुर का नजारा—त्रिपोलिया बाजार, सिटी पैलेस और अल्बर्ट हॉल की सीधी कतार—किसी जन्नत से कम नहीं लगता। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि जयपुर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का एक अभिन्न हिस्सा भी है।

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