एक संवाद और 2 घंटे में समाधान: सीएम के दखल से तो ‘सुपरफास्ट’ हुआ प्रशासन, लेकिन सवाल वही- बाकी मामलों में ऐसी फुर्ती क्यों नहीं?

Live Sach Profle Photo

जयपुर। प्रदेश में सुशासन की एक अनोखी तस्वीर शनिवार को सामने आई। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने संपर्क पोर्टल (Sampark Portal) पर दर्ज प्रकरणों की समीक्षा के दौरान एक परिवादी से सीधा संवाद किया। इसका असर यह हुआ कि डूंगरपुर जिला प्रशासन ने ‘रॉकेट की रफ्तार’ से काम करते हुए मात्र 2 घंटे में समस्या का निस्तारण कर दिया। लेकिन इस घटना ने जहां सीएम की संवेदनशीलता दिखाई, वहीं प्रशासनिक मशीनरी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।

सीएम ने पूछा हाल, तो दौड़ा प्रशासन

मुख्यमंत्री सुशासन के तहत लगातार संपर्क पोर्टल पर दर्ज शिकायतों की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने पोर्टल के माध्यम से डूंगरपुर के साबला तहसील निवासी जितेंद्र सिंह से संवाद किया।

  • जितेंद्र ने बताया कि उसने अपने बच्चों (संयम और क्रिया) के मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र के लिए 7 दिन पहले आवेदन किया था, लेकिन अब तक चक्कर ही काट रहा है।
  • सीएमओ (CMO) ने तुरंत डूंगरपुर कलेक्टर अंकित कुमार सिंह को मामले से अवगत कराया।
  • सूचना मिलते ही कलेक्ट्रेट में हड़कंप मच गया और जो फाइल 7 दिन से धूल फांक रही थी, उसे मात्र 2 घंटे में निपटाकर प्रमाण पत्र परिवादी के हाथ में थमा दिए गए।

सवाल: अगर सीएम बात नहीं करते, तो क्या होता?

प्रशासन की इस ‘हाइपर-एक्टिव’ कार्यवाही ने आम जनता के मन में कई सवाल पैदा कर दिए हैं। यह घटना बताती है कि सिस्टम में काम करने की क्षमता तो है, लेकिन नीयत की कमी है।

  1. 7 दिन तक क्यों अटकी थी फाइल? जिस काम को करने में प्रशासन को मात्र 120 मिनट (2 घंटे) लगे, वह काम पिछले एक हफ्ते से सामान्य प्रक्रिया में क्यों नहीं हुआ? क्या 7 दिन तक अधिकारी किसी ‘वीवीआईपी’ आदेश का इंतजार कर रहे थे?
  2. बाकी मामलों में सुस्ती क्यों? प्रदेश में संपर्क पोर्टल पर ऐसी हजारों शिकायतें लंबित हैं। सवाल यह है कि क्या हर नागरिक को न्याय पाने के लिए मुख्यमंत्री के फोन या संवाद का इंतजार करना पड़ेगा? बिना सीएम के दखल के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी और तय समय-सीमा (Right to Service) का पालन इतनी गंभीरता से क्यों नहीं करते?
  3. सुशासन या वीआईपी कल्चर? इसे सुशासन की मिसाल माना जाए या वीआईपी कल्चर का डर? असली सुशासन तब होगा जब सिस्टम ‘ऑटो-पायलट’ मोड में चले और एक आम आदमी की अर्जी पर भी उतनी ही तेजी से काम हो, जितनी तेजी सीएम के निर्देश पर दिखाई गई।

परिवादी को मिली राहत

हालांकि, परिवादी जितेंद्र सिंह के लिए यह सुखद अनुभव रहा। उन्होंने तत्काल प्रमाण पत्र बनने पर राज्य सरकार का आभार जताया। मुख्यमंत्री का यह प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है कि वे ग्राउंड लेवल पर फीडबैक ले रहे हैं, लेकिन अधिकारियों को यह संदेश देना भी जरूरी है कि हर फाइल को ‘सीएम की फाइल’ मानकर ही निपटाया जाए।

Live Sach – तेज़, भरोसेमंद हिंदी समाचार। राजनीति, राजस्थान से ब्रेकिंग न्यूज़, मनोरंजन, खेल और भारत की हर बड़ी खबर!

Share This Article