सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: राजस्थान के सरकारी और निजी स्कूलों में अनिवार्य होगी राजस्थानी भाषा

Madhu Manjhi

नई दिल्ली/जयपुर। राजस्थान की ‘मायड़ भाषा’ (राजस्थानी) को उसका खोया हुआ गौरव दिलाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला सुनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने राजस्थान सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं कि वह राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए ठोस और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करे। शीर्ष अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार से 30 सितंबर 2026 तक विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) भी तलब की है।

अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी भी बच्चे के सर्वांगीण विकास—चाहे वह बौद्धिक हो, सामाजिक हो या भावनात्मक—के लिए मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने राज्य सरकार की उस मौजूदा नीति की आलोचना की, जिसमें केवल संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को ही अतिरिक्त भाषा के रूप में पढ़ाया जा रहा है। खंडपीठ ने इसे “सीमित दृष्टिकोण” करार देते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और संविधान की मूल भावना भी बच्चों को उनकी अपनी भाषा में सीखने के अवसर प्रदान करने पर जोर देती है।

सांस्कृतिक गौरव को मिली कानूनी मान्यता

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थानी भाषा के समृद्ध साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जब यह भाषा पहले से ही प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है, तो इसकी शैक्षणिक मान्यता पर सवाल उठाना तर्कसंगत नहीं है। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि हालांकि न्यायालय नीति बनाने में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता, लेकिन जब संवैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन में लगातार सरकारी निष्क्रियता दिखाई दे, तब अदालत “मूकदर्शक” बनकर नहीं बैठ सकती।

4.36 करोड़ लोगों की उम्मीदों को मिला संबल

यह मामला पदम मेहता और अन्य द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें राजस्थानी भाषा को न केवल स्कूली शिक्षा बल्कि REET (रीट) और अन्य शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में भी शामिल करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी ने 2011 की जनगणना का हवाला देते हुए बताया कि करीब 4.36 करोड़ लोग राजस्थानी बोलते हैं। इतनी बड़ी आबादी की भाषा को शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान न मिलना उनके अधिकारों की अनदेखी है। गौरतलब है कि पूर्व में राजस्थान हाईकोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि नीतिगत मामलों में अदालत सीधे निर्देश जारी नहीं कर सकती, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा रुख ने राजस्थान के करोड़ों लोगों के लिए नई उम्मीद जगा दी है।

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