राजेश पायलट: दूध बेचने वाला लड़का जो वायुसेना का फाइटर और देश का धाकड़ नेता बना, पढ़ें अनसुनी कहानी

Rajesh Pilot Biography in Hindi: भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ ही नेता ऐसे हुए हैं, जिनका जीवन किसी प्रेरणादायक फिल्म की कहानी जैसा रहा है। फर्श से अर्श तक पहुंचने की ऐसी ही एक जीवंत मिसाल थे— राजेश पायलट (Rajesh Pilot)। 11 जून 2000 को एक दर्दनाक सड़क हादसे में दुनिया को अलविदा कहने वाले राजेश पायलट का असल नाम ‘राजेश्वर प्रसाद’ था।

गांव में दूध बेचने से लेकर आसमान में लड़ाकू विमान उड़ाने और फिर देश की राजनीति में एक कद्दावर केंद्रीय मंत्री बनने तक का उनका सफर अदम्य साहस, संघर्ष और दृढ़ इच्छाशक्ति की कहानी है। आइए उनके जीवन के हर पहलू को विस्तार से जानते हैं।

1. बचपन, परिवार और दिल्ली की सड़कों पर संघर्ष

  • जन्म और परिवार: राजेश पायलट (मूल नाम राजेश्वर प्रसाद सिंह बिधूड़ी) का जन्म 10 फरवरी 1945 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद (अब ग्रेटर नोएडा) के गांव वैदपुरा में एक साधारण गुर्जर किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम जय दयाल सिंह था।
  • बचपन का संघर्ष: बचपन में ही सिर से पिता का साया उठ जाने के कारण घर में घोर आर्थिक तंगी आ गई। राजेश्वर को अपना गांव छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। दिल्ली में उन्होंने अपने चचेरे भाई की डेयरी में काम किया। वे साइकिल पर लुटियंस दिल्ली (Lutyens’ Delhi) के रसूखदार नेताओं और अफसरों के बंगलों में दूध बांटने का काम करते थे।
  • शिक्षा: दूध बांटने के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और दिल्ली में फ्लाइंग (उड़ान) का प्रशिक्षण लिया।

2. आसमान की ऊंचाइयां: भारतीय वायुसेना में शौर्य

बचपन से ही आसमान में उड़ते विमानों को देखकर राजेश्वर प्रसाद पायलट बनने का सपना देखते थे। अपनी कड़ी मेहनत से उन्होंने भारतीय वायुसेना (IAF) में जगह बनाई।

  • कमीशन: 29 अक्टूबर 1966 को वे वायुसेना की जनरल ड्यूटी (पायलट) शाखा में ‘पायलट ऑफिसर’ के रूप में नियुक्त हुए।
  • 1971 का भारत-पाक युद्ध: जब 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, तब उन्होंने ‘बॉम्बर पायलट’ (Bomber Pilot) के रूप में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने युद्ध के दौरान अपना मोडिफाइड DHC-4 कैरिबू (Caribou) एयरक्राफ्ट उड़ाया और दुश्मन के ठिकानों पर बमबारी की।
  • 1977 में वे प्रमोट होकर ‘स्क्वाड्रन लीडर’ (Squadron Leader) बन गए।

वीरता के लिए मिले पदक (Medals): वायुसेना में उनकी बहादुरी के लिए उन्हें पूर्वी स्टार, स्पेशल सर्विस मेडल, संग्राम मेडल और सैन्य सेवा मेडल जैसे कई प्रतिष्ठित मेडल्स से सम्मानित किया गया।

3. राजनीति में एंट्री: ‘राजेश्वर’ से कैसे बने ‘राजेश पायलट’?

  • राजीव गांधी से मित्रता और वायुसेना से इस्तीफा: 1979 में जब वे जैसलमेर में तैनात थे, तब उनकी मुलाकात तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से हुई। राजीव गांधी से उनकी गहरी मित्रता हो गई। देश सेवा के एक नए जज्बे के साथ उन्होंने वायुसेना से इस्तीफा दे दिया।
  • पहला चुनाव और नया नाम (1980): 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें राजस्थान के भरतपुर से टिकट दिया। चुनाव प्रचार में सहूलियत और एक नई पहचान के लिए राजीव गांधी ने उन्हें ‘राजेश पायलट’ उपनाम अपनाने की सलाह दी। उन्होंने अपने पहले ही चुनाव में भरतपुर की पूर्व महारानी को हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
  • दौसा से अटूट रिश्ता: 1984 में उन्होंने अपनी कर्मभूमि दौसा (राजस्थान) को चुना। दौसा की जनता ने उन्हें इतना प्यार दिया कि वे 1984, 1991, 1996, 1998 और 1999 में लगातार वहां से सांसद चुने गए।

4. धाकड़ मंत्री और कड़े फैसले लेने वाले राजनेता

राजेश पायलट को उनकी बेबाकी और कड़े फैसले लेने के लिए जाना जाता था। उन्होंने केंद्र सरकार में भूतल परिवहन मंत्री, संचार मंत्री, आंतरिक सुरक्षा मंत्री और पर्यावरण मंत्री के रूप में काम किया।

  • चंद्रस्वामी की गिरफ्तारी (1995): जब वे पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री (Internal Security Minister) थे, तब उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरी दिल्ली में भूचाल ला दिया था। उस समय के बेहद रसूखदार और विवादित तांत्रिक ‘चंद्रस्वामी’ को बड़े-बड़े राजनेताओं का संरक्षण प्राप्त था। लेकिन राजेश पायलट ने बिना किसी दबाव की परवाह किए चंद्रस्वामी को गिरफ्तार करवा दिया।
  • पार्टी के भीतर लोकतंत्र की आवाज: 1997 में जब सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे, तब राजेश पायलट ने पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए केसरी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था। हालांकि वे हार गए, लेकिन उनके इस कदम ने पार्टी में उनकी एक निडर नेता की छवि मजबूत की।

5. ‘किसान का बेटा’ और जमीन से जुड़ाव

  • लुटियंस दिल्ली के सबसे आलीशान बंगलों में रहने के बावजूद वे हमेशा खुद को “किसान का बेटा” कहते थे।
  • किसानों और जवानों के कल्याण के लिए उन्होंने 1987 में ‘जय जवान जय किसान’ ट्रस्ट की स्थापना की।
  • एक दिलचस्प किस्सा 1988 का है, जब वे नीदरलैंड्स के दौरे पर थे। वहां की वायुसेना ने उन्हें अपना F-16 लड़ाकू विमान उड़ाने का मौका दिया। उनके कौशल को देखकर भारत लौटने पर भारतीय वायुसेना ने भी उन्हें अपना ‘मिग-29’ (MiG-29) टेस्ट करने के लिए आमंत्रित किया था।

6. दर्दनाक अंत और राजनीतिक विरासत

भारत सरकार के डाक विभाग ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। वहीं, नई दिल्ली में ‘गुर्जर राजेश पायलट मार्ग’ और गुरुग्राम में ‘राजेश पायलट रोड’ आज भी उनकी स्मृति को जिंदा रखे हुए हैं।

11 जून 2000: यह वह मनहूस दिन था जब दौसा के भंडाना के पास एक भीषण सड़क हादसे (जिप्सी और रोडवेज बस की टक्कर) में 55 वर्ष की आयु में इस कद्दावर नेता का निधन हो गया। उस वक्त वे खुद अपनी जिप्सी ड्राइव कर रहे थे।

विरासत: उनके निधन के बाद उनकी पत्नी रमा पायलट और बेटे सचिन पायलट (Sachin Pilot) ने उनकी राजनीतिक विरासत को संभाला। आज सचिन पायलट राजस्थान और देश के प्रमुख युवा नेताओं में शुमार हैं।

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