अस्पताल अधीक्षक के भरोसे नर्सिंग कॉलेज: 35 की जगह महज 8 ट्यूटर के सहारे चल रहा मरुधरा का एकमात्र एकीकृत संस्थान

Madhu Manjhi

अजमेर। राजस्थान सरकार द्वारा करोड़ों रुपये की भारी-भरकम बजटीय लागत से स्थापित किया गया अजमेर जिले के केकड़ी का ‘राजकीय मॉडल नर्सिंग इंस्टीट्यूट’ (Government Model Nursing Institute) आज स्वयं गंभीर प्रशासनिक और बुनियादी विधिक सुविधाओं के अभाव से आईसीयू में जाता हुआ प्रतीत हो रहा है। एएनएम (ANM), जीएनएम (GNM) और बीएससी नर्सिंग (BSc Nursing) जैसे अत्यधिक संवेदनशील और महत्वपूर्ण चिकित्सा पाठ्यक्रमों का संचालन करने वाले इस विधिक संस्थान में अध्ययनरत सैकड़ों छात्र-छात्राओं में व्यवस्थाओं को लेकर गहरा आक्रोश और असंतोष व्याप्त है। विद्यार्थियों का विधिक आरोप है कि कई बार जिला प्रशासन से लेकर चिकित्सा शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को लिखित ज्ञापन सौंपने और आंदोलन करने के बावजूद उनकी जायज मांगों पर कोई विधिक कार्रवाई नहीं की गई, जिससे उनका करियर और भविष्य अंधकार की ओर बढ़ रहा है।

राजनीतिक और प्रशासनिक फेरबदल के दौर में केकड़ी को जिला घोषित किए जाने के समय कई जिला स्तरीय बुनियादी सुविधाएं कागजों में शुरू तो की गई थीं, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के चलते इन व्यवस्थाओं की स्थिति लगातार वेंटिलेटर पर चली गई। पूरे राजस्थान में यह एकमात्र ऐसा विशिष्ट और एकीकृत संस्थान माना जाता है, जहां एएनएम, जीएनएम और बीएससी नर्सिंग तीनों की पढ़ाई और विधिक प्रशिक्षण एक ही परिसर के भीतर संचालित होता है, लेकिन धरातल पर सुविधाओं का शून्य होना सरकार के दावों की पोल खोलता है।

संस्थान का विधिक व सांख्यिकीय ऑडिट: सुविधाओं की विफलता का पूरा गणित

  • ट्यूटरों का टोटा (शिक्षण संकट): संस्थान के सुचारू विधिक संचालन के लिए 35 से अधिक ट्यूटर और व्याख्याताओं के पद स्वीकृत हैं। लेकिन सांख्यिकीय हकीकत यह है कि वर्तमान में यहां महज 6 से 8 ट्यूटर ही कार्यरत हैं। इसके कारण विद्यार्थियों की नियमित कक्षाएं, क्लीनिकल प्रशिक्षण और विधिक प्रैक्टिकल कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं।
  • हॉस्टल पर विधिक ताला: परिसर के भीतर करोड़ों की लागत से शानदार छात्र और छात्रा हॉस्टल का निर्माण वर्षों पूर्व विधिक रूप से पूर्ण कराया जा चुका है, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के कारण आज तक उसे शुरू (Handover) नहीं किया गया। इसके चलते सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य जिलों से आने वाले गरीब छात्र-छात्राओं को बाहरी गोवर्धन कॉलोनी व अन्य इलाकों में महंगे दामों पर निजी मकानों या किराये के कमरों में रहकर आर्थिक शोषण का शिकार होना पड़ रहा है।

आईएनसी (INC) मान्यता का मुद्दा: असमंजस में फंसा सैकड़ों विद्यार्थियों का करियर

कॉलेज में अध्ययनरत विद्यार्थियों की सबसे बड़ी और विधिक रूप से जायज चिंता इंडियन नर्सिंग काउंसिल (INC) की राष्ट्रीय मान्यता को लेकर है। छात्र-छात्राओं का कहना है कि लंबे समय से इस विधिक मुद्दे को लेकर राज्य स्तर पर संघर्ष किया जा रहा है, लेकिन राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (RUHS) और चिकित्सा शिक्षा निदेशालय के बीच आपसी समन्वय की कमी के चलते आईएनसी की केंद्रीय मान्यता का मुद्दा लंबित पड़ा है। इसके कारण डिग्री पूरी होने के बाद अन्य राज्यों या केंद्र सरकार के एम्स (AIIMS) जैसे बड़े अस्पतालों में मिलने वाले रोजगार और विधिक नौकरियों के अवसरों को लेकर छात्रों के मन में गहरा विधिक असमंजस और डर बना हुआ है।

स्थायी मुखिया नहीं, रपट बनी टापू और जर्जर बस से हादसों का डर

संस्थान की विधिक अव्यवस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इतने बड़े मॉडल इंस्टीट्यूट में कोई ‘स्थायी पूर्णकालिक प्राचार्य’ (Permanent Principal) ही तैनात नहीं है। वर्तमान में कॉलेज के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों का अतिरिक्त प्रभार केकड़ी जिला चिकित्सालय के अस्पताल अधीक्षक के पास है, जो खुद चिकित्सालय के काम के बोझ से दबे रहते हैं। इसके अलावा, मुख्य मार्ग से संस्थान तक पहुंचने वाली एकमात्र विधिक एप्रोच रोड पूरी तरह से बदहाल और गड्ढों में तब्दील हो चुकी है। आगामी मानसून-2026 की तैयारियों के दावों के बीच छात्रों ने बताया कि थोड़ी सी बारिश में ही सड़क पर 3-3 फीट पानी भर जाता है और पूरा परिसर किसी कटे हुए टापू जैसा नजर आता है।

हद तो तब हो जाती है जब छात्रों को क्लीनिकल ड्यूटी के लिए अस्पताल ले जाने वाली सरकारी कॉलेज बस के विधिक फिटनेस की धज्जियां उड़ती दिखती हैं। जर्जर हो चुकी इस बस में कई जगहों से लोहे की नुकीली चादरें और सरिए बाहर निकले हुए हैं, जिससे प्रतिदिन छात्र-छात्राओं के साथ गंभीर विधिक दुर्घटना का खतरा बना रहता है। नर्सिंग स्टूडेंट एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कड़ा विधिक रुख अपनाते हुए अल्टीमेटम दिया है कि यदि आगामी 7 कार्यदिवसों के भीतर बजट जारी कर ट्यूटर्स की विधिक नियुक्ति और हॉस्टल का आवंटन शुरू नहीं किया गया, तो वे अजमेर-कोटा स्टेट हाईवे को जाम कर उग्र आंदोलन करने पर विवश होंगे, जिसकी समस्त विधिक जिम्मेदारी जिला प्रशासन और राज्य सरकार की होगी।

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