VIP नंबर घोटाला या आंकड़ों का खेल? परिवहन विभाग की जांच रिपोर्ट कटघरे में, नियमों की अनदेखी का आरोप

Madhu Manjhi

जयपुर। परिवहन विभाग में 7 डिजिट वीआईपी (VIP) नंबर सीरीज के बैकलॉग घोटाले में तैयार की गई जांच रिपोर्ट ही अब गहरे सवालों के घेरे में आ गई है। विभाग की जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में 500 से 600 करोड़ रुपए के भारी-भरकम राजस्व नुकसान का दावा किया था। हैरानी की बात यह है कि रिपोर्ट पेश हुए एक साल बीत चुका है, लेकिन विभाग घोटालेबाजों से अब तक एक रुपए की भी रिकवरी नहीं कर पाया है।

इस मामले में गांधी नगर थाने में आरटीओ प्रथम की ओर से एफआईआर (FIR) दर्ज करवाई जा चुकी है और पुलिस दो आरोपियों को गिरफ्तार भी कर चुकी है। लेकिन, विभागीय स्तर पर संलिप्त डीटीओ (DTO) और कर्मचारियों से कोई वसूली नहीं हो सकी है। ऐसे में यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि यदि वास्तव में इतना बड़ा घोटाला हुआ है, तो रिकवरी की प्रक्रिया ठंडे बस्ते में क्यों है?

जांच रिपोर्ट में ही आंकड़ों का विरोधाभास

अपर परिवहन आयुक्त रेणु खंडेलवाल की अध्यक्षता वाली जांच कमेटी ने 17 अक्टूबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। अब इसी रिपोर्ट के आंकड़ों और नियमों की व्याख्या पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट में लगभग 10 हजार वीआईपी नंबरों का बैकलॉग कर फर्जी आवंटन बताया गया है, लेकिन नुकसान के आंकड़ों में भारी अंतर है:

रिपोर्ट का दावाप्रति नंबर अनुमानित कीमतकुल राजस्व नुकसान का दावा
पहला दावा2 से 15 लाख रुपए500 से 600 करोड़ रुपए
दूसरा दावा1 से 2 लाख रुपए100 से 200 करोड़ रुपए

एक ही जांच रिपोर्ट में औसत कीमत को लेकर इतना बड़ा विरोधाभास है, जो इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

हकीकत: हर VIP नंबर लाखों में नहीं बिकता

विशेषज्ञों का मानना है कि परिवहन विभाग के सभी 10 हजार वीआईपी नंबर लाखों में नहीं बिकते। केवल 0001, 0009, 9999 जैसे कुछ चुनिंदा नंबरों की बोली ही 2 से 10 लाख रुपए तक जाती है। अधिकांश वीआईपी नंबर 11 हजार से 51 हजार रुपए की बेस प्राइस के आसपास ही बिकते हैं। ऐसे में जांच रिपोर्ट द्वारा सभी 10 हजार नंबरों की औसत कीमत लाखों में मानकर 600 करोड़ का नुकसान बताना व्यावहारिक नहीं लगता।

पुराने नंबरों की नीलामी का प्रावधान नहीं

इस पूरी जांच का एक प्रमुख आधार नंबरों का पुन: आवंटन है। हालांकि, ‘मोटर व्हीकल एक्ट’ (Motor Vehicle Act) और विभागीय नियमों के अनुसार एक बार आवंटित हो चुके नंबर को दोबारा नीलाम नहीं किया जा सकता है। इसके बावजूद जांच कमेटी ने नंबरों के पुन: आवंटन को आधार बनाकर नुकसान की गणना की है, जिससे कानूनी रूप से रिपोर्ट कमजोर साबित हो रही है।

जयपुर में 2129 नंबर संदिग्ध, कार्रवाई शून्य

जांच के दौरान अकेले जयपुर आरटीओ (RTO) में 2129 वीआईपी नंबरों को संदिग्ध माना गया था। इनमें से:

  • 1879 नंबरों के दस्तावेजों का सत्यापन हो चुका है।
  • 250 नंबरों का सत्यापन अभी भी लंबित है।

दस्तावेजों के सत्यापन के बावजूद अब तक किसी भी वाहन स्वामी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।

“विभाग के कुछ अधिकारी 7 डिजिट नंबरों में राजस्व नुकसान का बड़ा घोटाला बता रहे हैं, लेकिन अभी तक मुझे आधिकारिक रूप से कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। रिपोर्ट मिलने और उसका अध्ययन करने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। रिकवरी के लिए अभी तक किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को नोटिस जारी नहीं किया गया है।”

– विभागीय अधिकारी

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