थाने से CCTV फुटेज गायब और आधी रात को युवतियों की गिरफ्तारी; राजस्थान हाई कोर्ट ने खाकी के आचरण को बताया ‘अवैध’

Madhu Manjhi

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर के कुड़ी भगतासनी थाने में पिछले साल हुए एक विवादास्पद पुलिस ऑपरेशन और महिलाओं की अवैध हिरासत के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार उपमन की एकल पीठ ने पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूरे प्रकरण की अग्रिम जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है। कोर्ट ने पुलिस के आचरण को न केवल संदिग्ध माना, बल्कि इसे वैधानिक प्रक्रियाओं और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन करार दिया है।

क्या है पूरा मामला?

मामला 15 जनवरी 2025 का है, जब जोधपुर पुलिस ने ‘ऑपरेशन साइबर शील्ड’ के तहत एक कथित कॉल सेंटर के खिलाफ कार्रवाई की थी। याचिकाकर्ता प्रियंका मेवाड़ा, लक्षिता व अन्य ने अदालत को बताया कि 15 जनवरी की शाम पुलिस ने बिना किसी एफआईआर या शिकायत के उन्हें उनके घरों से जबरन उठाया। दस युवतियों को पूरी रात कुड़ी भगतासनी थाने में अवैध हिरासत में रखा गया, जबकि इस मामले में आधिकारिक एफआईआर अगले दिन यानी 16 जनवरी को शाम 3:37 बजे दर्ज की गई।

हाईकोर्ट ने पकड़ी पुलिस की बड़ी चूक

सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की तहकीकात में कई ऐसे विरोधाभासी तथ्य पाए, जिन्होंने ‘खाकी’ की साख को कठघरे में खड़ा कर दिया:

  • सीसीटीवी का गायब होना: याचिकाकर्ताओं के घरों के बाहर लगे सीसीटीवी में उप निरीक्षक शिमला को सरकारी वाहन में युवतियों को ले जाते हुए स्पष्ट देखा गया, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से कुड़ी भगतासनी थाने का 15 जनवरी की रात 9 बजे के बाद का सीसीटीवी फुटेज गायब मिला।
  • दस्तावेजों में हेराफेरी: पुलिस के रोजनामचा (Daily Diary) में 15 जनवरी को युवतियों को थाने लाने का कोई उल्लेख नहीं था। एफआईआर में भी 15 जनवरी की शाम हुई कार्रवाई को पूरी तरह छुपाया गया।
  • सूर्यास्त के बाद गिरफ्तारी का उल्लंघन: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना महिला मजिस्ट्रेट की अनुमति के सूर्यास्त के बाद महिलाओं को थाने ले जाना बीएनएस (BNS) की धारा 43(5) और 179 का सीधा उल्लंघन है।

अधिकारियों पर गिरेगी गाज

अदालत ने तत्कालीन पुलिस निरीक्षक राजेंद्र चौधरी और उप निरीक्षक शिमला के आचरण पर कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कुड़ी भगतासनी थानाधिकारी को निर्देश दिया है कि वे एक सप्ताह के भीतर मामले से जुड़ा सारा रिकॉर्ड सीबीआई को सौंपें।

“जब पुलिस स्वयं संज्ञेय अपराध की सूचना के बिना नागरिकों को अवैध रूप से हिरासत में रखती है और सबूतों (सीसीटीवी) के साथ छेड़छाड़ करती है, तो निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह मामला कानून के रखवालों द्वारा ही कानून के उल्लंघन का उत्कृष्ट उदाहरण है।” – राजस्थान हाईकोर्ट

अग्रिम कार्रवाई और निर्देश

  • जांच की समय सीमा: सीबीआई को रिकॉर्ड प्राप्ति के 6 माह के भीतर जांच पूरी करने को कहा गया है।
  • ट्रायल पर रोक: जब तक सीबीआई अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं कर देती, तब तक निचली अदालत में इस मामले की सुनवाई स्थगित रहेगी।
  • जवाबदेही: एसीपी बोरानाडा आनंदसिंह राजपुरोहित को पूर्व में नोडल अधिकारी बनाया गया था, लेकिन उनकी रिपोर्ट और धरातल के साक्ष्यों में भारी अंतर पाए जाने पर कोर्ट ने जांच एजेंसी बदलने का निर्णय लिया।

Live Sach – तेज़, भरोसेमंद हिंदी समाचार। राजनीति, राजस्थान से ब्रेकिंग न्यूज़, मनोरंजन, खेल और भारत की हर बड़ी खबर!

Share This Article