राजस्थान के सरहदी इलाकों में शिक्षा की मशाल जलाने के लिए ग्रामीणों की प्रतिबद्धता मिसाल बन रही है। पोकरण क्षेत्र के छायण गांव की ‘प्रेमराम की ढाणी’ में ग्रामीणों ने विद्यालय भवन के अभाव में बच्चों की पढ़ाई को रुकने नहीं दिया और स्वयं आगे बढ़कर कमरों की व्यवस्था की है।
15 साल का इंतजार और ग्रामीणों की पहल
- छायण गांव की इस ढाणी में वर्ष 2011 में राजकीय प्राथमिक विद्यालय स्वीकृत हुआ था।
- स्वीकृति के 15 साल बाद भी विभाग द्वारा यहाँ भवन का निर्माण नहीं कराया गया।
- बच्चों को चिलचिलाती धूप से बचाने के लिए ग्रामीणों ने मिलकर ईंटों से कमरेनुमा ढांचा बनाया और उस पर छप्पर डालकर एक पारंपरिक ‘झोपड़ा’ तैयार किया।
गर्मी में राहत देता ‘देसी’ समाधान
ग्रामीणों द्वारा बनाया गया यह झोपड़ा तपती गर्मी में भी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। वर्तमान में यहाँ करीब 35 विद्यार्थी बिना किसी अधिक परेशानी के अपनी पढ़ाई कर पा रहे हैं। यह पहल न केवल बच्चों को सुरक्षित स्थान प्रदान करती है, बल्कि उन्हें लू और तेज गर्मी से भी बचाती है।
सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे भविष्य
संसाधनों की कमी के साथ-साथ यहाँ शिक्षकों की भी भारी कमी है। यह विद्यालय वर्तमान में केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहा है। स्थिति यह है कि यदि संबंधित शिक्षक को सरकारी बैठकों, कार्यालय संबंधी कार्यों या अन्य आधिकारिक ड्यूटी पर जाना पड़ता है, तो उस दिन विद्यालय की छुट्टी रखनी पड़ती है।
अन्य क्षेत्रों का भी यही हाल
भवन के अभाव में स्कूलों के संचालन की समस्या केवल छायण तक सीमित नहीं है:
- खाबडा गांव (मेघराजसर): यहाँ भी पिछले तीन वर्षों से विद्यालय भवन नहीं बना है।
- किशनपुरा और मेघवालों की ढाणी (सांकड़ा): इन क्षेत्रों में भी भवन विहीन स्कूल सभाभवनों या उपलब्ध कमरों में संचालित किए जा रहे हैं।
संपादकीय टिप्पणी: “जब सरकारें बुनियादी ढांचा प्रदान करने में विफल रहती हैं, तब समुदाय की शक्ति ही बदलाव लाती है। जैसलमेर के इन ग्रामीणों ने साबित कर दिया है कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो संसाधनों की कमी शिक्षा के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती।”