सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: वसीयत फर्जी निकलने पर खरीदार पर नहीं चलेगा मुकदमा, कार्यवाही को बताया प्रक्रिया का दुरुपयोग

Madhu Manjhi

सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के क्रय-विक्रय से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई वसीयत बाद में विवादित या फर्जी निकलती है, तो केवल इसी आधार पर संपत्ति खरीदने वाले व्यक्ति पर धोखाधड़ी या जालसाजी का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में खरीदार का कोई आपराधिक दायित्व नहीं बनता है।

क्या है पूरा मामला? यह मामला सितंबर 1988 की एक विवादित वसीयत से जुड़ा है, जिसके आधार पर 1998 में कई लोगों को जमीन बेच दी गई थी। बाद में अपीलकर्ता (खरीदार) पर फर्जी वसीयत के जरिए धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश रचने के आरोप लगाए गए। हाईकोर्ट ने इस मामले को रद्द करने की अर्जी खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वसीयत के निर्माण में अपीलकर्ता (खरीदार) की भूमिका का कोई साक्ष्य नहीं है। अदालत ने कहा कि वसीयत के मामले में अपीलकर्ता की कोई संलिप्तता नहीं पाई गई है, इसलिए उनके खिलाफ आपराधिक मामले को आगे बढ़ाना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही रद्द सुप्रीम कोर्ट ने एक अपीलकर्ता के खिलाफ लंबे समय से चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आदेश दिया। बेंच ने माना कि आरोपी बनाना कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल था, क्योंकि खरीदार ने संपत्ति खरीदी थी और वसीयत के फर्जी होने में उसकी सीधी भूमिका साबित नहीं हुई थी।


कानूनी महत्व: यह फैसला उन संपत्ति खरीदारों के लिए एक बड़ी सुरक्षा कवच की तरह है जो सद्भाव (Good Faith) के साथ संपत्ति खरीदते हैं, लेकिन बाद में दस्तावेजों में त्रुटि या फर्जीवाड़ा निकलने पर अदालती चक्करों में फंस जाते हैं।

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