बरसाने में आसमान पूरी तरह से लाल हो चुका है और गली-गली में फाग का उल्लास गूंज रहा है। ब्रह्माचल पर्वत पर स्थित लाडिली मंदिर से लेकर रंगीली गली, रंगीली चौक और पीली पोखर तक हर तरफ बस रसिया गीतों की गूंज है। यह नजारा है विश्व प्रसिद्ध बरसाने की लट्ठमार होली का, जहां नंदगांव के हुरियारे (होली खेलने वाले पुरुष) और बरसाने की हुरियारिनों (गोपियों) के बीच अद्भुत प्रेम और परंपरा का संगम देखने को मिलता है। बरसाना राधा रानी का गांव है और नंदगांव श्रीकृष्ण का, इसलिए इन दोनों जगहों की होली पूरे विश्व में चर्चित है।
नंदगांव के हुरियारे और बरसाने की रंगीली चौक

परंपरा के अनुसार, नंदगांव से पैदल आए हुरियारों का समूह दोपहर में सबसे पहले बरसाने की पीली पोखर पर जमा होता है। वहां ठंडाई छानने के बाद डफ-झांझ और मंजीरे बजाते हुए यह समूह लाडिली मंदिर (कीर्ति मंदिर) पहुंचता है। दर्शन और पारंपरिक समाज गायन के बाद शाम करीब पांच बजे हुरियारे रंगीली चौक पर पहुंचते हैं। रंग-बिरंगे धोती-कुर्ते पहने और सिर पर पगड़ी बांधे ये हुरियारे अपने हाथों में ढाल लेकर जमीन पर बैठ जाते हैं, और यहीं से शुरू होती है लाठियों और ढाल की असली रस्साकशी।
लोकगीतों की तान और गोपियों की लाठियां

रंगीली चौक पर एक-एक हुरियारे को कई हुरियारिनें घेर लेती हैं और उनकी ढाल पर तड़ातड़ लाठियां बरसाना शुरू कर देती हैं। दिलचस्प बात यह है कि महिलाएं लंबा घूंघट किए रहती हैं, लेकिन पूरी ताकत और उछल-उछल कर लाठियां चलाती हैं। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच होली के रसियों और सवैयों के जरिए हंसी-ठिठोली चलती रहती है। महिलाएं गाती हैं- ‘मत मारे दृगन की चोट, होरी में मेरे लग जाएगी’, तो हुरियारे जवाब देते हैं- ‘घूंघट खोल दिखाए दे तेरे नारंगी से गाल’। प्रहार सहते-सहते जब कोई हुरियारे थक जाता है, तो वह हुरियारिन के पैर छूकर गुहार लगाता है कि ‘अब वह हार गया, उसे छोड़ दें’, जिसके बाद दूसरा हुरियारे उसकी जगह ले लेता है।
40-50 सालों का अनुभव और कड़ा अनुशासन

इस अद्भुत होली में शामिल होने वाले कई हुरियारे ऐसे हैं जो अपनी 40वीं या 50वीं होली खेल रहे हैं, जिनकी उम्र 7-8 साल से लेकर 65-70 वर्ष तक होती है। वहीं, लाठियां बरसाने वाली हुरियारिनें वे महिलाएं होती हैं जिनका ससुराल बरसाना होता है। ये महिलाएं वसंत पंचमी से ही अपना खान-पान अच्छा कर लेती हैं और लाठियों को तेल पिलाकर तैयार करती हैं। इस होली का अनुशासन इतना कड़ा होता है कि कोई भी हुरियारे महिलाओं पर रंग या गुलाल की एक बूंद तक नहीं डालता। अगर ढाल से बचकर किसी हुरियारे को लाठी की चोट लग भी जाती है, तो वे संक्रमण की फिक्र किए बिना जमीन से ‘ब्रज रज’ (मिट्टी) उठाकर सीधे अपनी चोट पर लगा लेते हैं।
