बीटू बायपास 42 बीघा जमीन मामला: सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्ट में अपील के निस्तारण तक हाउसिंग बोर्ड नहीं कर सकेगा कोई तोड़फोड़

Madhu Manjhi

जयपुर। जयपुर के प्रतिष्ठित बीटू (B2) बायपास स्थित 2200 करोड़ रुपये की बेशकीमती 42 बीघा जमीन को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में एक नया मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस जमीन पर राजस्थान हाउसिंग बोर्ड (RHB) द्वारा की जा रही तोड़फोड़ और बेदखली की कार्रवाई पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक राजस्थान हाईकोर्ट में लंबित अपील का निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक बचे हुए 10 मकानों में किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या कार्रवाई नहीं की जाएगी।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश?

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह रोक श्रीराम नगर-बी कॉलोनी विकास समिति की अपील को निस्तारित करते हुए लगाई है। दरअसल, समिति के वकील आशीष शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के 9 अप्रैल के आदेश (जिसमें बोर्ड को कब्जा लेने को कहा गया था) पर डिवीजन बेंच ने 21 अप्रैल को रोक लगा दी थी। लेकिन 18 मई को डिवीजन बेंच ने बिना किसी स्पष्ट कारण के अचानक यह रोक हटा ली, जबकि मूल अपील अभी भी हाईकोर्ट में लंबित है।

समिति ने मांग की थी कि 18 मई के रोक हटाने के आदेश को रद्द किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को मानते हुए अपील तय होने तक यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं।

बोर्ड ने 23-24 मई को की थी बड़ी कार्रवाई

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा 18 मई को रोक हटाए जाने के तुरंत बाद, राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने तेजी दिखाते हुए 23 और 24 मई को इस बेशकीमती जमीन पर एक बड़ा अभियान चलाया। भारी पुलिस जाब्ते के साथ बोर्ड ने अधिकांश मकान और दुकानों को ढहा दिया और जमीन के बड़े हिस्से पर अपना कब्जा ले लिया। वर्तमान में इस विवादित जमीन पर सिर्फ 10 मकान ही बचे हैं, जिन्हें अब सुप्रीम कोर्ट से फौरी राहत मिल गई है।

1989 से चल रहा है विवाद का खेल

इस बेशकीमती जमीन का इतिहास काफी पुराना और विवादित है:

  • अधिग्रहण: हाउसिंग बोर्ड प्रशासन ने साल 1989 में इस जमीन को अवाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसे 1991 में पूरा कर लिया गया। हालांकि, तब जमीन पर भौतिक कब्जा नहीं लिया गया था।
  • भूमाफियाओं की एंट्री: इस बीच, जमीन पर भूमाफिया सक्रिय हो गए। उन्होंने ‘जवाहरपुरी भवन निर्माण सहकारी समिति’ के फर्जी पट्टों के आधार पर यहां श्रीराम नगर-बी कॉलोनी बसा दी और भूखंडों को बिका हुआ दिखा दिया। आरोप है कि कई रसूखदारों ने कौड़ियों के दाम पर यहां प्लॉट खरीदे।
  • 2019 में जेडीए और हाउसिंग बोर्ड में टकराव: साल 2019 में जब कॉलोनी के नियमन के लिए जेडीए (JDA) ने हाउसिंग बोर्ड से एनओसी (NOC) मांगी, तो तत्कालीन बोर्ड कमिश्नर ने इसे देने से साफ इनकार कर दिया। बोर्ड का तर्क था कि जब जमीन पर 50 फीसदी निर्माण ही नहीं है, तो नियमन कैसे किया जा सकता है। इसके बाद सोसाइटी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की गई और मामला एसीबी (ACB) को भेज दिया गया।

हाईकोर्ट का रुख: 27 दिन में पलट गए थे आदेश

इस मामले में हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 9 अप्रैल को बोर्ड की याचिका मंजूर करते हुए साफ कहा था कि यह 42 बीघा जमीन राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की है, क्योंकि सरकार जमीन मालिकों को पहले ही मुआवजा दे चुकी है। सिंगल बेंच ने जेडीए की 29 मई 1995 को दी गई योजना स्वीकृति को अवैध करार दिया और मकानों को हटाकर बोर्ड को कब्जा लेने का आदेश दिया।

इस आदेश को डिवीजन बेंच में चुनौती दी गई, जिसने 21 अप्रैल को रोक लगा दी। लेकिन 18 मई को यह रोक हटा ली गई। कोर्ट ने तब टिप्पणी की थी कि डिवीजन बेंच पहले से ही हाउसिंग बोर्ड की जमीन पर बसी 87 कॉलोनियों के नियमन के खिलाफ सुनवाई कर रही है और अपीलकर्ताओं ने बोर्ड के साथ मिलीभगत कर यह तथ्य अदालत से छिपाया था।

अब सबकी निगाहें राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो इस 2200 करोड़ की जमीन का भविष्य तय करेगा।

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