मेडिकल कॉलेजों की भर्ती में RPSC की अनदेखी? 3 सीनियर डॉक्टरों की कमेटी पर उठे सवाल, सीएम और चिकित्सा मंत्री को लिखा पत्र

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जयपुर | राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (RUHS) मेडिकल कॉलेज, रिम्स (RIMS) और इससे अटैच सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल्स में एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर की सीधी भर्ती को लेकर नया प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। सरकार द्वारा इन उच्च पदों पर नियुक्ति के लिए बनाई गई विशेष स्क्रीनिंग कमेटी का भारी विरोध शुरू हो गया है। राजस्थान मेडिकल कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन (RMCTA) ने इस पूरी प्रक्रिया पर कड़ा एतराज जताते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और चिकित्सा मंत्री को एक पत्र लिखा है। एसोसिएशन ने सरकार से इस स्क्रीनिंग कमेटी को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने और ‘लेटरल एंट्री’ के तर्ज पर होने वाली इस तरह की भर्ती प्रक्रिया पर भविष्य के लिए हमेशा रोक लगाने की मांग की है।

चिकित्सा शिक्षा विभाग (Medical Education Department) ने हाल ही में इन महत्वपूर्ण एकेडमिक पदों के लिए 3 सीनियर डॉक्टरों की एक उच्च स्तरीय स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी में सवाई मानसिंह (SMS) मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. दीपक माहेश्वरी, आरयूएचएस मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. मोहनीश ग्रोवर और रिम्स के ओएसडी (OSD) डॉ. अजीत सिंह को शामिल किया गया है। यह कमेटी आरयूएचएस कॉलेज और रिम्स में प्रोफेसर तथा एसोसिएट प्रोफेसर के रिक्त पदों को भरने के लिए अभ्यर्थियों की स्क्रीनिंग करेगी, जिसके लिए मुख्य रूप से स्वास्थ्य विभाग के ‘ग्रुप-2’ के प्रिंसिपल स्पेशलिस्ट और सीनियर स्पेशलिस्ट कैडर के डॉक्टरों से आवेदन मांगे गए हैं।

लेटरल एंट्री से गिरेगी मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता

आरएमसीटीए के अध्यक्ष डॉ. धीरज जैफ ने इस नीतिगत फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक तरफ राज्य सरकार रिम्स जैसे उच्च स्तरीय संस्थान विकसित करने के दावे कर रही है, जहां उत्कृष्ट चिकित्सा सेवा, उच्च गुणवत्ता वाली मेडिकल शिक्षा और विश्वस्तरीय शोध (रिसर्च) की अपेक्षा की जाती है। प्रदेश के गंभीर से गंभीर रोगियों का अंतिम रेफरल भी इसी संस्थान में होगा। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे प्रीमियम संस्थानों में केवल लंबे क्लीनिकल कार्यानुभव के आधार पर उन ग्रुप-2 के डॉक्टर्स को सीधे प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर बना दिया जाना कहीं से भी उचित नहीं है, जिनका कोई टीचिंग या शैक्षणिक अनुभव ही नहीं है।

एसोसिएशन के अध्यक्ष ने अपने पत्र में स्पष्ट लिखा है कि यह कदम प्रदेश की मेडिकल शिक्षा को धूमिल करने वाला है। बिना किसी एकेडमिक बैकग्राउंड के सीधे वरिष्ठ प्रोफेसर बनाने से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता, शोध की उत्कृष्टता और संस्थान की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा होगा।

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RPSC की अनदेखी से युवाओं में रोष

पत्र में दलील दी गई है कि प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सक शिक्षकों (Medical Teachers) की नियुक्ति सदैव राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से ही होती आई है। ऐसे में चयन आयोग को दरकिनार कर स्क्रीनिंग कमेटी के जरिए बैकडोर से सीधे प्रोफेसर बनाना नियमों के खिलाफ है। एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि इस नई व्यवस्था से दिन-रात मेहनत करने वाले नए और युवा चिकित्सकों के आगे बढ़ने के एकेडमिक अवसर खत्म हो जाएंगे, जिससे उनका मनोबल बुरी तरह टूटेगा। फिलहाल सरकार की ओर से इस पूरे विवाद पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन चिकित्सकों के इस कड़े रुख के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग पर इस फैसले को री-रिव्यू करने का दबाव बढ़ गया है।

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