जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) को तगड़ा झटका देते हुए टोंक रोड पर स्थित करीब 1500 करोड़ रुपए मूल्य की 9000 वर्गमीटर जमीन के मामले में जेडीए की विशेष अपील को खारिज कर दिया है। एक्टिंग सीजे संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने एकलपीठ के 2009 के आदेश में किसी भी प्रकार के दखल से इनकार करते हुए उसे बरकरार रखा है। कोर्ट ने जेडीए को निर्देश दिया है कि वह प्रार्थी ‘साई दर्शन होटल्स एंड मोटल्स’ के पक्ष में तत्काल आवंटन आदेश जारी करे।
सरकार अपने फैसलों से पीछे नहीं हट सकती:
हाईकोर्ट सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने माना कि राज्य सरकार ने वर्ष 2003 में जो आवंटन के आदेश दिए थे, वे वैध थे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब संबंधित पक्ष (प्रार्थी) ने सरकार के आश्वासनों पर भरोसा कर अपने सभी पुराने मुकदमे वापस ले लिए थे, तो अब सरकार या जेडीए अपने वादे से पीछे नहीं हट सकते। खंडपीठ ने कहा कि एकलपीठ का प्रार्थी को 15 फीसदी विकसित जमीन का हकदार मानना पूरी तरह न्यायसंगत है।
जेडीए की ‘भ्रष्टाचार’ और ‘आर्थिक नुकसान’ की दलीलें खारिज
जेडीए की ओर से पैरवी करते हुए दलील दी गई कि जमीन का आवंटन अवैध तरीके से हुआ है और इससे सरकारी खजाने को भारी आर्थिक नुकसान होगा। जेडीए ने मामले में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। हालांकि, खंडपीठ ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि आवंटन राज्य सरकार की तत्कालीन नीति के अनुरूप था। कोर्ट ने यह भी कहा कि जेडीए कई वर्षों से इस जमीन का उपयोग कर रहा है, जबकि मूल मालिकों या उनके उत्तराधिकारियों को आज तक उचित मुआवजा नहीं मिला है।
क्या है 57 साल पुराना मामला? इस विवाद की जड़ें वर्ष 1969 से जुड़ी हैं:
- 1969-71: सांगानेर तहसील की इस जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई।
- 1981: अंतिम अवार्ड पारित कर राशि कोर्ट में जमा कराई गई, लेकिन खातेदारों ने राशि कम बताते हुए कब्जा देने से इनकार किया।
- 1982: जेडीए ने अधिसूचना के जरिए जमीन का कब्जा लिया।
- 2003: प्रार्थी ने खातेदारों के असाइनी के तौर पर 15% विकसित जमीन की मांग की। राज्य सरकार ने मई 2003 में आवंटन के आदेश दिए, लेकिन जून 2009 में इन्हें स्थगित कर दिया गया।
हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद अब जेडीए को टोंक रोड जैसी प्राइम लोकेशन पर यह बेशकीमती जमीन निजी कंपनी को सौंपनी होगी।