‘व्हाट्सएप कॉल से मिली थी सूचना’, एसीबी कोर्ट ने खारिज की महेश जोशी की याचिका, गिरफ्तारी को ठहराया सही

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जयपुर। जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में राजस्थान के पूर्व जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी (PHED) मंत्री महेश जोशी को अदालत से बड़ा झटका लगा है। विशेष एसीबी (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) कोर्ट संख्या-2 ने पूर्व मंत्री महेश जोशी की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपनी गिरफ्तारी को गैर-कानूनी बताते हुए रिहाई की मांग की थी। महेश जोशी के वकीलों का तर्क था कि गिरफ्तारी के समय परिजनों को लिखित सूचना नहीं दी गई थी, जो नियमों का उल्लंघन है। हालांकि, अदालत ने तकनीकी और मौखिक साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए एसीबी की कार्रवाई को पूरी तरह वैध माना है।

क्या था महेश जोशी का पक्ष?

पूर्व मंत्री महेश जोशी की ओर से कोर्ट में प्रार्थना पत्र पेश कर दलील दी गई थी कि 7 मई को जब एसीबी ने उन्हें गिरफ्तार किया, तो कानूनी प्रक्रियाओं को ताक पर रख दिया गया। उनके वकील के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के अनिवार्य दिशा-निर्देशों के तहत किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना और उसकी पावती (Apostille/Receipt) रिमांड की मांग करने से पहले परिजनों या वकील को देना आवश्यक है। लिखित सूचना न मिलने के आधार पर उन्होंने इस पूरी गिरफ्तारी को असंवैधानिक और अवैध बताते हुए तुरंत रिहा किए जाने की मांग की थी।

एसीबी ने कोर्ट में पेश किए ‘व्हाट्सएप कॉल’ के स्क्रीनशॉट

विशिष्ट लोक अभियोजक मंजूला जैन ने पूर्व मंत्री के दावों का कड़ा विरोध किया। एसीबी की ओर से अदालत को बताया गया कि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भूपेन्द्र सिंह के नेतृत्व में एक विशेष टीम गिरफ्तारी आदेश लेकर महेश जोशी के आवास पर पहुंची थी। उस समय वहां उनके पुत्र रोहित जोशी, पुत्रवधू और बड़ी बहन मौजूद थीं, जिन्हें टीम ने अपना परिचय पत्र दिखाकर ब्यूरो मुख्यालय ले जाने की स्पष्ट जानकारी दी थी।

मुख्यालय पर गिरफ्तारी के बाद इसकी सूचना सुबह सामान्य फोन कॉल और उसके बाद रोहित जोशी के मोबाइल पर ‘व्हाट्सएप कॉल’ (WhatsApp Call) के जरिए दी गई। इतना ही नहीं, जब आरोपी को कोर्ट ले जाया जा रहा था और कोर्ट परिसर पहुंचने पर भी व्हाट्सएप कॉल से लगातार सूचनाएं साझा की गईं। ब्यूरो ने पुख्ता सबूत के तौर पर इन कॉल्स के स्क्रीनशॉट भी अदालत के समक्ष पेश किए।

कोर्ट का फैसला: ‘बीएनएसएस की धारा 48 का उद्देश्य पूरा हुआ’

मामले की सुनवाई करते हुए जज राजेश कुमार दड़िया ने पूर्व मंत्री के प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 48 का मुख्य उद्देश्य अभियुक्त के ‘बचाव करने के अधिकार’ (Right to Defense) को सुरक्षित रखना है।

अदालत की मुख्य टिप्पणी: “इस मामले में जब आरोपी को कोर्ट में रिमांड के लिए पेश किया गया, तब उनके वकील वहां पहले से मौजूद थे और उन्होंने रिमांड पर विस्तृत बहस भी की थी। इससे यह साफ सिद्ध होता है कि परिजनों और विधिक प्रतिनिधियों को समय पर गिरफ्तारी की पूरी जानकारी थी। सूचना तकनीकी व मौखिक माध्यमों से समय पर मिल चुकी थी, इसलिए इसे अवैधानिक नहीं कहा जा सकता।”

अब हाईकोर्ट पर टिकी नजरें

इस मामले में कानूनी लड़ाई अब और तेज हो गई है। महेश जोशी के बेटे रोहित जोशी द्वारा राजस्थान हाईकोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की गई है। इस याचिका पर बुधवार को हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होनी है, जिस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

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