जयपुर जिले के चाकसू क्षेत्र के कादेड़ा और आसपास के गांवों में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत एक बड़ा प्रशासनिक और तकनीकी ‘खेल’ उजागर हुआ है। हाल ही में हुई भीषण ओलावृष्टि और तेज तूफान के बाद जब किसानों ने अपनी बर्बाद हुई गेहूं और चने की फसल के मुआवजे के लिए आवेदन किया, तो पोर्टल पर दर्ज जानकारी देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। किसानों का आरोप है कि उन्होंने अपने खेतों में गेहूं और चना बोया था, लेकिन सहकारी समितियों और बीमा रिकॉर्ड में उनकी फसल को ‘सरसों’ के रूप में दर्ज कर दिया गया है। इस विसंगति के कारण अब उन्हें नियमानुसार क्लेम मिलने की उम्मीद लगभग खत्म हो गई है।
यह गड़बड़ी उस समय शुरू हुई जब किसानों ने सहकारी समिति के माध्यम से फसली ऋण लिया था। ऋण वितरण के दौरान ही नियमानुसार बीमा प्रीमियम की राशि काट ली गई थी। किसान इस भरोसे में थे कि रबी की फसल (गेहूं और चना) सुरक्षित है, लेकिन आपदा आने पर पता चला कि रिकॉर्ड में फसल का विवरण ही बदल दिया गया है। कादेड़ा निवासी किसान अशोक खण्डेलवाल सहित भागीरथ रेगर, मोहनलाल और शंकर सिंह जैसे कई किसानों ने जब 72 घंटे के भीतर नुकसान की सूचना दी, तो पोर्टल ने उन्हें गेहूं के बजाय सरसों का बीमित किसान बताया। किसानों का कहना है कि यह केवल मानवीय भूल नहीं, बल्कि एक संगठित लापरवाही है जिससे सैकड़ों किसान प्रभावित हुए हैं।
इस पूरे मामले पर अधिकारियों के विरोधाभासी बयान सामने आ रहे हैं। ऋण पर्यवेक्षक शंकर सिंह का कहना है कि किसानों को अपनी फसल की जानकारी स्वयं देनी चाहिए, अन्यथा समिति अपने स्तर पर फसल का चयन कर लेती है। वहीं, चाकसू क्रय-विक्रय सहकारी समिति के चेयरमैन मदन चौधरी ने इसे गंभीर मामला मानते हुए उच्चाधिकारियों और कृषि मंत्री के समक्ष उठाने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। पूर्व चेयरमैन हिम्मत सिंह ने इसे किसानों के साथ सीधा छलावा करार देते हुए कहा कि इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ रही है। फिलहाल, क्षेत्र के किसान ठगा सा महसूस कर रहे हैं और सरकार से विशेष गिरदावरी करवाकर वास्तविक फसल के आधार पर मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
V. फसल बीमा: नियम और हकीकत का अंतर
| नियम/प्रक्रिया | चाकसू में क्या हुआ? (हकीकत) |
| प्रीमियम दर | रबी फसल के लिए 1.5% प्रीमियम काटा गया। |
| फसल का चयन | किसानों ने गेहूं बोया, पर रिकॉर्ड में ‘सरसों’ चढ़ा दी गई। |
| क्लेम की शर्त | नुकसान के 72 घंटे में सूचना देना अनिवार्य (जो किसानों ने दी)। |
| मुआवजा आधार | वास्तविक फसल और बीमित फसल का मिलान न होने से क्लेम अटका। |
| सत्यापन | डीबीटी के जरिए राशि मिलनी थी, जो अब खतरे में है। |
VI. पीड़ितों की जुबानी (Quotes)
“मेरे खेत में गेहूं है, लेकिन बीमा सरसों का कर दिया गया। जब ओले गिरे और क्लेम मांगा तो पता चला कि मैं गेहूं का नहीं, सरसों का किसान हूँ। यह हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा है।”
— अशोक खण्डेलवाल, पीड़ित किसान (कादेड़ा)
“यदि बीमा में कोई अनियमितता हुई है तो हम इसे कृषि मंत्री के पास ले जाएंगे। किसानों का हक उन्हें मिलना चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।”
— मदन चौधरी, चेयरमैन, क्रय-विक्रय सहकारी समिति चाकसू