राजधानी के वीआईपी क्षेत्र जगतपुरा में विकास की आड़ में एक ऐसा खेल खेला जा रहा है जिसे विशेषज्ञ ‘सुनियोजित इकोलॉजिकल मर्डर’ करार दे रहे हैं। खसरा नंबर 192/819 (जी-ब्लॉक, सेंट्रल स्पाइन) में प्राकृतिक जल निकासी और ग्रीन बेल्ट को कंक्रीट की सड़क में तब्दील कर दिया गया है। यह मामला न केवल प्रशासनिक मिलीभगत का प्रमाण है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के दावों पर भी बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
कागजों और हकीकत का विरोधाभास
सरकारी दस्तावेजों में जिस भूमि को “गैर-मुमकिन नाला” और “ग्रीन बेल्ट” के रूप में दर्ज किया गया है, वहां आज 100 फीट चौड़ी सड़क खड़ी है। नियमों के अनुसार, नाले के दोनों ओर 30-30 फीट का बफर जोन (No Construction Zone) अनिवार्य है। लेकिन यहां बफर जोन छोड़ना तो दूर, पूरे नाले के अस्तित्व को ही मिटाकर उस पर कंक्रीट की परत चढ़ा दी गई है।
न्यायिक आदेशों की खुली अवमानना
माननीय उच्च न्यायालय ने गुलाब कोठारी बनाम राजस्थान राज्य (2017) के ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी प्राकृतिक जल निकाय या बहाव क्षेत्र के स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। इसके बावजूद, जगतपुरा में हुआ यह निर्माण सीधे तौर पर अदालत की अवहेलना प्रतीत होता है।
प्लानिंग या प्लॉटिंग? विशेषज्ञों के सवाल
शहरी नियोजन (Urban Planning) के सिद्धांतों को चुनौती देते हुए, महज 50 मीटर की दूरी पर 100 फीट और 80 फीट की दो समानांतर सड़कें प्रस्तावित कर दी गईं। स्थानीय जानकारों का कहना है कि यह शहर की जरूरत के लिए ‘प्लानिंग’ नहीं, बल्कि चुनिंदा भूखंडों को लाभ पहुंचाने के लिए की गई ‘प्लॉटिंग’ का हिस्सा है।
वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट
यह क्षेत्र नीलगाय और अन्य स्थानीय वन्यजीवों के लिए एक प्राकृतिक गलियारे (Natural Corridor) का काम करता था। सड़क निर्माण ने न केवल उनके आवास को नष्ट किया है, बल्कि भविष्य में ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष’ की संभावनाओं को भी बढ़ा दिया है।
जन आक्रोश और जांच की मांग
‘LIVE SACH’ द्वारा इस मामले को उजागर किए जाने के बाद स्थानीय निवासियों और पर्यावरण प्रेमियों में भारी गुस्सा है। अब मांग उठ रही है कि:
- इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच हो।
- जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उन पर कार्रवाई की जाए।
- नाले के मूल स्वरूप को बहाल किया जाए ताकि भविष्य में शहरी बाढ़ (Urban Flooding) के खतरे से बचा जा सके।