जेल की सलाखों से लेकर ‘मलाईदार’ पोस्टिंग तक, जानिए IAS नीरज के. पवन की पूरी कहानी

जयपुर: राजस्थान ब्यूरोक्रेसी में अगर किसी आईएएस अधिकारी का नाम सबसे ज्यादा विवादों, चर्चाओं और जनता के बीच लोकप्रिय होने के लिए जाना जाता है, तो वह हैं 2003 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. नीरज के. पवन। हाल ही में राज्य सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए उन्हें खेल विभाग के सचिव पद से हटाकर इंदिरा गांधी पंचायतीराज संस्थान (IGPRS) का महानिदेशक नियुक्त किया है।

हर नई सरकार और हर नई ट्रांसफर लिस्ट के साथ नीरज के. पवन का नाम सुर्खियों में आ ही जाता है। आइए जानते हैं राजस्थान के इस सबसे ‘चर्चित’ अफसर की पूरी बायोग्राफी और उनके करियर के उतार-चढ़ाव।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा: बचपन से ही था IAS बनने का जुनून

डॉ. नीरज के. पवन का जन्म 27 अगस्त 1979 को राजस्थान के झालावाड़ जिले में हुआ था । उनके पिता पुलिस विभाग में थे और माता एक शिक्षिका थीं। नीरज की पूरी शुरुआती शिक्षा गांव के शुद्ध सरकारी स्कूलों में हिंदी माध्यम से हुई। उन्होंने विज्ञान (B.Sc.) के बाद क्लीनिकल साइकोलॉजी में गहरी रुचि दिखाई और इसी विषय में एमएससी (M.Sc.), एमफिल (M.Phil) और बाद में पीएचडी (Ph.D) तक की शिक्षा हासिल की। हिंदी मीडियम से होने के बावजूद उन्होंने पहले ही प्रयास में सिविल सेवा परीक्षा (UPSC) पास कर ली और 2003 में आईएएस बने।

करियर के सुनहरे पल: जब ‘सुपर कॉप’ और ‘संकटमोचक’ बनकर उभरे

नीरज के. पवन को एक बेहतरीन ‘फील्ड अफसर’ माना जाता है। जब भी वे किसी जिले या संभाग में तैनात रहे, उनकी कार्यशैली ने आम जनता का ध्यान खींचा:

  • कलेक्टर के रूप में: वे डूंगरपुर, करौली, पाली और भरतपुर जैसे जिलों के जिला कलेक्टर रहे। जनता के बीच जाकर काम करने की उनकी शैली ने उन्हें बेहद लोकप्रिय बनाया।
  • गुर्जर आंदोलन के ‘हीरो’: वर्ष 2015 में जब राजस्थान में गुर्जर आरक्षण आंदोलन चरम पर था और पटरियां उखाड़ी जा रही थीं, तब तत्कालीन सरकार ने नीरज के. पवन को अपना मुख्य वार्ताकार बनाकर भेजा था। कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के साथ उनकी बेहतरीन बातचीत और तालमेल ने उस उग्र आंदोलन को शांत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी।
  • संभागीय आयुक्त: बीकानेर और हाल ही में नवगठित बांसवाड़ा संभाग के पहले संभागीय आयुक्त के रूप में उन्होंने अतिक्रमण के खिलाफ बड़े अभियान चलाए, जिसमें वे खुद सड़कों पर उतरकर कार्रवाई करते नजर आए।

विवादों का गहरा साया: जब खानी पड़ी जेल की हवा

नीरज के. पवन का करियर जितना चमकदार रहा है, उतना ही यह भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से भी घिरा रहा है:

  1. NRHM घोटाला (2016): यह उनके करियर का सबसे बड़ा दाग माना जाता है। नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (NRHM) में टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी और करोड़ों रुपए के घूसकांड में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने उन्हें गिरफ्तार किया था। इस मामले में एक आईएएस अधिकारी होने के बावजूद उन्हें करीब 9 महीने जेल में बिताने पड़े थे।
  2. RSLDC घूसकांड (2021): जेल से बाहर आने और बहाल होने के बाद जब उन्हें राजस्थान कौशल विकास निगम (RSLDC) का चेयरमैन बनाया गया, तो वहां भी वे ACB के रडार पर आ गए। रिश्वत के एक मामले में उनके कार्यालय पर छापा पड़ा, जिसके बाद उन्हें वहां से हटा दिया गया।
  3. बांसवाड़ा का हालिया विवाद: हाल ही में बांसवाड़ा में रेलवे के लिए जमीन अधिग्रहण के एक मामले में उन पर नियमों की अनदेखी करने का आरोप लगा, जिससे रेलवे पर करीब 20 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार पड़ने की बात सामने आई। इसकी शिकायत सीधे मुख्य सचिव तक पहुंची थी।

सियासी रसूख: हर सरकार में ‘खास’

राजस्थान में हर पांच साल में सरकार बदल जाती है, लेकिन नीरज के. पवन का रसूख कभी नहीं बदलता। चाहे भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस की, जेल जाने और भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद उन्हें हमेशा ‘प्राइम’ (मलाईदार) पोस्टिंग मिलती रही है।

राजनीतिक गलियारों में माना जाता है कि उनका ‘नेटवर्क’ और राजनेताओं के साथ काम करने की उनकी क्षमता इतनी मजबूत है कि कोई भी सरकार उन्हें ज्यादा दिनों तक लूप-लाइन (APO) में नहीं रख पाती।

आगे की राह…

अब उन्हें खेल विभाग से हटाकर IGPRS का महानिदेशक बनाया गया है। इसे कुछ लोग उनकी ‘साइड लाइन’ पोस्टिंग मान रहे हैं, लेकिन ब्यूरोक्रेसी के जानकारों का कहना है कि नीरज के. पवन वह नाम है जो किसी भी पद को ‘पावरफुल’ बनाने का हुनर जानता है। उनकी इस नई पारी पर अब पूरे प्रशासनिक महकमे की नजरें टिकी हैं।

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