केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने समय की गणना के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक ‘ग्रीनविच मीन टाइम’ (GMT) को हटाकर उसकी जगह ‘महाकाल स्टैंडर्ड टाइम’ (MST) लागू करने का बड़ा प्रस्ताव दिया है। मध्य प्रदेश के उज्जैन में ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ विषय पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उन्होंने यह बात कही। उनका कहना है कि उज्जैन ऐतिहासिक रूप से समय गणना का मूल केंद्र रहा है और अब समय आ गया है कि भारत के इस प्राचीन वैज्ञानिक गौरव को वैश्विक स्तर पर फिर से तार्किक रूप से स्थापित किया जाए।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने तर्क दिया कि उज्जैन वह स्थान है जहां भूमध्य रेखा और कर्क रेखा आपस में मिलती हैं, और यहीं से प्राचीन काल में दुनिया भर के समय की गणना की जाती थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि समय गणना का असली और मूल केंद्र उज्जैन के आसपास का क्षेत्र ही है। मंत्री ने यह स्पष्ट किया कि भारत के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र, जैसे उज्जैन, काशी और कांची, केवल पूजा के स्थान नहीं रहे हैं, बल्कि ये विज्ञान, कला, संस्कृति और आध्यात्मिकता की ‘जीवंत प्रयोगशाला’ (Living Laboratories) रहे हैं।
इस पहल को राज्य सरकार का भी पूरा समर्थन मिला है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस प्रस्ताव का बचाव करते हुए कहा कि सूर्योदय, सूर्यास्त और ग्रहों की गति पर आधारित पारंपरिक भारतीय समय मापन प्रणाली, ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) की तुलना में कहीं अधिक सटीक और वैज्ञानिक है। उन्होंने ‘सूर्य सिद्धांत’ जैसे प्राचीन ग्रंथों का हवाला देते हुए बताया कि हमारे पूर्वजों ने युगों पहले इसे स्थापित किया था और उज्जैन लंबे समय से खगोल विज्ञान का वैश्विक केंद्र रहा है। सरकार अब उज्जैन को एक प्रमुख धार्मिक नगरी के साथ-साथ एक ‘साइंस सिटी’ के रूप में भी तेजी से विकसित करने की दिशा में काम कर रही है, जिसके तहत हाल ही में 15 करोड़ रुपये की लागत से एक साइंस सेंटर का उद्घाटन भी किया गया है।
इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आनी शुरू हो गई हैं। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने इस पहल की तीखी आलोचना करते हुए इसे विकास के ठोस एजेंडे की कमी बताया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सड़कों और शहरों के नाम बदलने के बाद अब समय के मानक को बदलना ही सत्ता पक्ष के विकास का नया मॉडल है। इन राजनीतिक आलोचनाओं के बावजूद, सरकार वैज्ञानिक समुदायों और विचारकों से आग्रह कर रही है कि वे ऐतिहासिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर समय गणना के ढांचे पर नए सिरे से विचार करें।