राजस्थान में जमीनी विवादों के दलदल में न्याय की उम्मीद दम तोड़ती नजर आ रही है। राज्य के राजस्व न्यायालयों (Revenue Courts) से आई ताज़ा रिपोर्ट ने न्याय प्रक्रिया की कछुआ चाल को बेनकाब कर दिया है। वर्तमान में प्रदेश में 6.72 लाख से ज्यादा जमीनी केस लंबित हैं। हैरानी की बात यह है कि कुछ कोर्ट ने तो पूरे वित्त वर्ष (2025-26) में महज एक ही केस का निपटारा किया है।
SDM कोर्ट बने ‘सफेद हाथी’?
रिपोर्ट के मुताबिक, कुल लंबित मामलों का 64 फीसदी हिस्सा यानी करीब 4.33 लाख मामले अकेले एसडीएम (SDM) स्तर पर अटके हुए हैं। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा उन अदालतों का है जहाँ साल भर में काम के नाम पर खानापूर्ति हुई:
- एसडीओ कोर्ट सादूलशहर (गंगानगर): पूरे साल में सिर्फ 1 केस का निपटारा।
- सहायक कलेक्टर कोर्ट टोंक: पूरे साल में सिर्फ 1 केस का निपटारा।
- एडिशनल जिला कलेक्टर (SDM) कोर्ट फलोदी: यहाँ भी सालभर में महज 1 मामला सुलझा।
तीन दशक से चल रही है ‘इंसाफ की जंग’
न्याय मिलने में हो रही देरी का आलम यह है कि कई पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन जमीन का फैसला नहीं हुआ:
- 5 से 10 साल: 1.34 लाख मामले।
- 20 से 30 साल: 6,000 मामले।
- 30 साल से ज्यादा: 330 मामले।
क्यों लगा है फाइल का अंबार? (3 मुख्य कारण)
सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में इस लेटलतीफी के पीछे तीन बड़े ‘विलेन’ बताए गए हैं:
- प्रशिक्षण का अभाव: अधिकांश स्टाफ के पास रेवेन्यू कोर्ट में काम करने का न तो अनुभव है और न ही उन्हें उचित ट्रेनिंग दी गई है।
- नोटिस तामील में देरी: पक्ष-विपक्ष को नोटिस भेजने और आदेशों की तामील करने की प्रक्रिया इतनी सुस्त है कि तारीखें बढ़ती रहती हैं।
- मौका रिपोर्ट का इंतजार: तहसीलदार, पटवारी और अन्य अधिकारियों से मांगी जाने वाली ग्राउंड रिपोर्ट (मौका रिपोर्ट) वक्त पर नहीं आती, जिससे मामला अधर में लटक जाता है।
एक्सपर्ट व्यू: क्या हो सकता है असर?
जमीनी विवादों में देरी न केवल किसानों और आम जनता की जेब पर भारी पड़ती है, बल्कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में अपराध और विवाद भी बढ़ते हैं। सरकार की रिव्यू बैठक में इन आंकड़ों को गंभीरता से लिया गया है और उम्मीद है कि जल्द ही ‘स्पेशल ड्राइव’ चलाकर इन मामलों को निपटाया जाएगा।