जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारी अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को रेखांकित किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कर्मचारी को ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ (Principles of Natural Justice) के तहत सुनवाई का अवसर दिए बिना उसकी पूरी पेंशन को स्थायी रूप से रोकना पूरी तरह से गैर-कानूनी है। जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC) के एक पूर्व कर्मचारी की पेंशन रोकने के आदेश को सिरे से खारिज करते हुए रोडवेज प्रशासन को नए सिरे से नियमसम्मत प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए हैं।
भ्रष्टाचार में दोषसिद्धि और विभाग की त्वरित कार्रवाई
यह मामला आरसआरटीसी (RSRTC) में ऑफिस असिस्टेंट के पद पर कार्यरत रहे रामजीलाल जांगिड़ से जुड़ा है। वर्ष 2018 में उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत एक मामले में दोषी ठहराया गया था, जिसमें अदालत ने उन्हें तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद, रोडवेज प्रशासन ने 31 जनवरी 2019 को एक आदेश जारी कर उनकी पेंशन रोक दी। बाद में इस आदेश को तकनीकी आधार पर चुनौती दी गई क्योंकि आदेश सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी नहीं था। इसके बाद निगम के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ने 28 अप्रैल 2021 को नया आदेश जारी कर उनकी पूरी पेंशन को स्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
| पक्ष | प्रमुख तर्क और दलीलें |
| याचिकाकर्ता पक्ष (अधिवक्ता अंशुमान सक्सेना) | * पेंशन एक वैधानिक अधिकार है। इसे बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के नहीं छीना जा सकता। * आदेश से पहले न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का मौका मिला। * पेंशन विनियम, 1989 के तहत केवल पूर्ण पेंशन रोकना ही एकमात्र विकल्प नहीं था; आंशिक रोक या सीमित अवधि जैसे कम कठोर दंड के विकल्प भी मौजूद थे। * यह आदेश “नॉन-एप्लिकेशन ऑफ माइंड” (बिना उचित विचार के) पारित किया गया है। |
| रोडवेज प्रशासन (RSRTC) | * याचिकाकर्ता भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामले में न्यायालय द्वारा दोषी सिद्ध हो चुके हैं और जेल की सजा काट रहे हैं। * भ्रष्टाचार सरकारी सेवा में गंभीर कदाचार की श्रेणी में आता है, इसलिए पूरी पेंशन रोकना जायज है। * एक बार जब न्यायालय द्वारा अपराध सिद्ध कर दिया गया हो, तो विभाग के स्तर पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को लागू करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। |
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां: “अधिकार असीमित नहीं”
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत ने माना कि दोषसिद्धि निःसंदेह एक गंभीर मामला है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रशासनिक तंत्र तय प्रक्रियाओं को दरकिनार कर दे। कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु स्पष्ट किए:
- ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ होना अनिवार्य: केवल दोषसिद्धि का हवाला देकर सबसे कड़ा दंड थोप देना पर्याप्त नहीं है। आदेश में स्पष्ट होना चाहिए कि प्राधिकारी ने कम कठोर दंड देने की संभावनाओं पर विचार क्यों नहीं किया। निर्णय के पीछे के तार्किक कारण स्पष्ट दिखने चाहिए।
- विकल्पों की अनदेखी गलत: राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम कर्मचारी पेंशन विनियम, 1989 के विनियम-4 के तहत पूर्ण पेंशन रोकने, आंशिक रोकने या निश्चित अवधि के लिए रोकने जैसे कई विकल्प हैं। सीधे सबसे कठोर दंड चुनना बिना सोचे-समझे लिया गया निर्णय प्रतीत होता है।
- डिवीजन बेंच का पूर्व रुख: इससे पहले 6 अप्रैल 2022 को इस मामले की डिवीजन बेंच ने भी स्पष्ट किया था कि इस प्रकार के प्रशासनिक मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत अनिवार्य रूप से लागू होंगे।
हाईकोर्ट के सख्त निर्देश
अदालत ने RSRTC के 28 अप्रैल 2021 के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनः सक्षम प्राधिकारी के पास भेज दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि:
- नए सिरे से आदेश पारित करने से पहले कर्मचारी को अनिवार्य रूप से कारण बताओ नोटिस दिया जाए।
- उसे अपना पक्ष रखने और व्यक्तिगत सुनवाई का उचित अवसर प्रदान किया जाए।
- यदि रोडवेज प्रशासन तीन माह के भीतर नियमों के अनुसार कारणयुक्त आदेश पारित नहीं करता है, तो याचिकाकर्ता की पेंशन और उसकी बकाया राशि को कानून के अनुसार तुरंत बहाल करना होगा।