बड़ा फैसला: थाने में वीडियो बनाना अपराध नहीं; बॉम्बे हाई कोर्ट ने रद्द की FIR, पुलिस को दी नसीहत

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मुंबई/औरंगाबाद – क्या पुलिस थाने के अंदर वीडियो बनाना अपराध है? क्या पुलिसकर्मी की बातचीत रिकॉर्ड करने पर आप पर ‘जासूसी’ का मुकदमा चल सकता है? इन सवालों पर विराम लगाते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस स्टेशन के अंदर वीडियो रिकॉर्डिंग करना ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’ (Official Secrets Act, 1923) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इसे ‘जासूसी’ मानने से इनकार करते हुए आरोपियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द (Quash) कर दिया है।

क्या था पूरा मामला? (Case Background)

यह मामला महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के पाथर्डी पुलिस स्टेशन से जुड़ा है।

  • घटना: 21 अप्रैल 2022 को दो भाई—सुभाष अठारे और संतोष अठारे—एक पड़ोसी के साथ विवाद के सिलसिले में थाने गए थे। वहां उनकी पुलिस अधिकारियों के साथ बहस हो गई।
  • रिकॉर्डिंग: इस दौरान सुभाष ने अपने मोबाइल फोन से पुलिस थाने के अंदर की गतिविधियों और पुलिसकर्मी के साथ हो रही बातचीत का वीडियो रिकॉर्ड कर लिया।
  • पुलिस की कार्रवाई: पुलिस ने इसे ‘सरकारी गोपनीयता’ का उल्लंघन मानते हुए दोनों भाइयों के खिलाफ ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’ की धारा 3 (जासूसी) और IPC की धारा 353 (सरकारी काम में बाधा) के तहत FIR दर्ज कर ली।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “कानून का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं”

जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस बी.पी. देशपांडे की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए।

  1. प्रतिबंधित स्थान (Prohibited Place): कोर्ट ने कहा कि ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’ की धारा 2(8) के तहत ‘प्रतिबंधित स्थान’ की एक परिभाषा है। पुलिस स्टेशन इस परिभाषा के दायरे में नहीं आता है। यह कोई सैन्य ठिकाना या गुप्त परमाणु केंद्र नहीं है।
  2. जासूसी नहीं है: जजों ने कहा कि पुलिस थाने में अपनी शिकायत लेकर गए व्यक्ति द्वारा वीडियो बनाना जासूसी कैसे हो सकता है? उसका उद्देश्य शत्रु देश को जानकारी देना नहीं, बल्कि अपने हितों की रक्षा करना था।

फैसले का आम जनता पर क्या होगा असर?

यह फैसला आम नागरिकों के अधिकारों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है:

  • पारदर्शिता बढ़ेगी: अक्सर थानों में पुलिसकर्मियों द्वारा दुर्व्यवहार, रिश्वत मांगने या शिकायत न लिखने की खबरें आती हैं। अब नागरिक डर के बिना सबूत के तौर पर वीडियो बना सकेंगे।
  • पुलिस की मनमानी पर रोक: पुलिस अक्सर ‘जासूसी’ या ‘सरकारी काम में बाधा’ का डर दिखाकर वीडियो डिलीट करवा देती थी या जेल भेजने की धमकी देती थी। यह फैसला इस ‘ब्लैकमेल’ को खत्म करेगा।
  • जवाबदेही: कोर्ट ने साफ किया कि ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (जो कि अंग्रेजों के जमाने का 1923 का कानून है) का इस्तेमाल नागरिकों की आवाज दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।

कानूनी स्थिति: क्या कहते हैं नियम?

  • केस टाइटल: सुभाष अठारे बनाम महाराष्ट्र राज्य (आपराधिक आवेदन 3421/2022)
  • निष्कर्ष: पुलिस स्टेशन में वीडियोग्राफी करना ‘जासूसी’ (Spying) नहीं है।

सावधानी जरूरी:

हालाँकि, कानूनी जानकारों का कहना है कि वीडियो बनाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि आप पुलिस के काम में शारीरिक रूप से बाधा न डालें और न ही किसी महिला पीड़ित या किशोर की पहचान उजागर करें, क्योंकि वह अन्य कानूनों (जैसे POCSO या IPC) के तहत अपराध हो सकता है। लेकिन केवल वीडियो बनाने पर ‘जासूसी’ का केस नहीं बनेगा।

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