एशिया की पहली महिला लड़ाकू रेजिमेंट: ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ की अनसुनी कहानी, जिसे नेताजी ने बनाया था दुश्मन का काल

प्रतिकात्मक फोटो

आज जब हम गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय सेना की महिला अधिकारियों को राफेल उड़ाते या ‘डेयरडेविल्स’ बनकर मोटरसाइकिल पर करतब दिखाते देखते हैं, तो हमारा सीना गर्व से फूल जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एशिया की पहली पूर्ण महिला लड़ाकू रेजिमेंट (First All-Women Combat Regiment in Asia) बनाने का श्रेय भी भारत और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जाता है? यह कहानी है ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ की, जिसने 1943 में ही दुनिया को बता दिया था कि भारतीय नारी अबला नहीं, बल्कि सबला और वीरांगना है।

1. स्थापना और विजन: 1943 का वह क्रांतिकारी फैसला द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, जब दुनिया की बड़ी-बड़ी सेनाएं महिलाओं को केवल नर्सिंग या सिग्नल्स तक सीमित रखती थीं, तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने एक क्रांतिकारी सपना देखा। 12 जुलाई 1943 को सिंगापुर में उन्होंने आजाद हिंद फौज (INA) के तहत ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ की स्थापना की। उनका मानना था कि भारत की आजादी की लड़ाई तब तक पूरी नहीं हो सकती, जब तक इसमें देश की आधी आबादी यानी महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर न लड़ें।

2. नेतृत्व: कैप्टन लक्ष्मी सहगल के हाथ में कमान इस रेजिमेंट का नेतृत्व युवा डॉक्टर लक्ष्मी स्वामीनाथन (बाद में कैप्टन लक्ष्मी सहगल) को सौंपा गया। नेताजी के एक आह्वान पर दक्षिण-पूर्व एशिया (सिंगापुर, मलाया, बर्मा) में रहने वाले भारतीय परिवारों की लड़कियों ने अपने गहने त्याग दिए और वर्दी पहनकर बंदूक थाम ली। इनमें से अधिकांश ने पहले कभी हथियार नहीं देखे थे, लेकिन देशप्रेम के जुनून ने उन्हें ‘योद्धा’ बना दिया।

3. कठिन प्रशिक्षण और ‘गुरिल्ला वॉरफेयर’ इस रेजिमेंट में लगभग 1,500 महिलाएं शामिल थीं (नर्सिंग कोर को मिलाकर यह संख्या और अधिक थी)।

  • ट्रेनिंग: इन्हें लड़कों की तरह ही कठोर सैन्य प्रशिक्षण दिया गया। राइफल चलाना, ग्रेनेड फेंकना, बेयोनेट चार्ज (संगीन से हमला) और जंगल में छिपकर वार करना (गुरिल्ला युद्ध) इनकी ट्रेनिंग का हिस्सा था।
  • वर्दी: खाकी वर्दी, टोपी और कंधे पर राइफल—यह उनका नया श्रृंगार था।
  • अनुशासन: इनका अनुशासन इतना कड़ा था कि जापानी सेना भी (जो उस समय INA की सहयोगी थी) इनका लोहा मानती थी।

4. युद्ध के मैदान में शौर्य 1944 में जब आजाद हिंद फौज ने बर्मा (म्यांमार) के रास्ते भारत की सीमा की ओर कूच किया, तो रानी झांसी रेजिमेंट की टुकड़ियां भी मोर्चे पर तैनात थीं। इम्फाल और कोहिमा के अभियानों के दौरान, जब रसद की कमी और दुश्मन की बमबारी ने हालात मुश्किल कर दिए, तब भी इन वीरांगनाओं ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। उन्होंने न केवल घायलों की सेवा की, बल्कि जरूरत पड़ने पर हथियार उठाकर गोलीबारी भी की।

5. आधुनिक भारत में विरासत (2026 का संदर्भ) आज 2026 में, जब भारतीय सेना में महिलाओं को परमानेंट कमीशन मिल रहा है और वे सियाचिन से लेकर फाइटर जेट्स तक हर जगह तैनात हैं, तो इसकी नींव रानी झांसी रेजिमेंट ने ही रखी थी।

  • BSF और आधुनिक सेना: वर्तमान में BSF की महिला प्रहरी, CRPF की कोबरा कमांडो और सेना की विभिन्न कोर में तैनात महिलाएं उसी ‘रानी झांसी’ की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।

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