जयपुर। राजस्थान सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम’ (RGHS) के तहत इलाज करा रहे हजारों परिवारों के सामने एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है। प्रदेश के आरजीएचएस दवा काउंटरों से मानसिक रोग, ऑटिज्म और न्यूरो डेवलपमेंटल डिसऑर्डर (स्नायु विकास संबंधी विकार) से जुड़ी बेहद जरूरी दवाएं गायब हैं। यह संकट अब केवल दवाओं की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा और घातक असर उन मासूम बच्चों व गंभीर मरीजों की जिंदगी पर पड़ रहा है, जिनका पूरा जीवन, पढ़ाई, नौकरी और सामाजिक अस्तित्व इन दवाओं पर ही निर्भर है।
मासूमों के व्यवहार में बदलाव, बच्चों ने छोड़ा स्कूल
अभिभावकों का आरोप है कि आरजीएचएस स्टोर्स पर जाने पर उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। कई आवश्यक दवाएं या तो स्टॉक में नहीं हैं, या फिर स्टोर संचालकों द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि इन दवाओं को योजना के दायरे से बाहर कर दिया गया है। दवाओं की इस अचानक कमी या अनुपलब्धता का परिणाम बेहद चिंताजनक सामने आ रहा है।
जो बच्चे इन दवाओं के नियमित सेवन से एक सामान्य जीवन जी रहे थे, उनके व्यवहार में अचानक भारी नकारात्मक बदलाव देखा जा रहा है। बच्चों में:
- अत्यधिक गुस्सा और चिड़चिड़ाहट काफी ज्यादा बढ़ गई है।
- अनिद्रा (नींद न आना) और मानसिक बेचैनी की गंभीर समस्याएं पैदा हो गई हैं।
- हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि कई अभिभावकों को अपने बच्चों का स्कूल छुड़ाना पड़ा है, क्योंकि बिना दवाओं के उनका व्यवहार संभालना माता-पिता के लिए बेहद मुश्किल हो रहा है।
विशेषज्ञों की बड़ी चेतावनी: ‘रिलैप्स’ का बढ़ा खतरा
इस संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए मानसिक रोग विशेषज्ञों ने सरकार और प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी है। डॉक्टरों का कहना है कि ऑटिज्म, एडीएचडी (ADHD), एंग्जायटी (चिंता) और डिप्रेशन जैसी बीमारियों की दवाएं आम सर्दी-खांसी या बुखार की दवाओं की तरह नहीं होती हैं।
“इन जीवन रक्षक दवाओं का एक बेहद निश्चित कोर्स, खुराक (डोज) और समय होता है। यदि इन दवाओं का डोज बीच में ही छूट जाए या अचानक दवा बदल दी जाए, तो मरीज की स्थिति सुधरने की बजाय पहले से भी ज्यादा गंभीर हो सकती है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘रिलैप्स’ होना कहते हैं। यह मरीजों के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है।” — वरिष्ठ मनोचिकित्सक
सपोर्ट फाउंडेशन ने चिकित्सा सचिव से लगाई गुहार
पीड़ित परिवारों की लाचारी और बच्चों के बिगड़ते हालात को देखते हुए ऑटिज्म के क्षेत्र में काम करने वाली प्रमुख संस्था ‘सपोर्ट फाउंडेशन फॉर ऑटिज्म एंड डेवलपमेंटल डिसएबिलिटीज’ ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया है। संस्था ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख शासन सचिव को एक आधिकारिक पत्र भेजकर इस मामले में तुरंत व्यक्तिगत दखल देने की मांग की है। संस्था का कहना है कि यदि समय रहते दवाओं की निर्बाध आपूर्ति बहाल नहीं की गई, तो हजारों बच्चों का भविष्य अंधकार में डूब जाएगा।
पीड़ित परिवारों की प्रमुख मांगें और लाचारी
- महंगी दवाओं का वित्तीय बोझ: आरजीएचएस के तहत कैशलेस सुविधा न मिलने के कारण मजबूरन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को निजी मेडिकल स्टोर्स से जेब ढीली कर बेहद महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं, जिससे उनका घरेलू बजट बिगड़ गया है।
- विशेष श्रेणी में शामिल करने की मांग: अभिभावकों और सामाजिक संस्थाओं ने सरकार से पुरजोर मांग की है कि मानसिक और न्यूरो रोगों की दवाओं को ‘आवश्यक सतत दवा’ (Essential Continuous Medicine) की श्रेणी में शामिल किया जाए, ताकि भविष्य में कभी भी बजटीय या प्रशासनिक कारणों से इनकी सप्लाई बाधित न हो सके।