कोटा। राजस्थान के कोटा संभाग में प्रसव के दौरान पांच महिलाओं की दर्दनाक मौत के मामले में एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर खुलासा हुआ है। राज्य सरकार की उच्च स्तरीय जांच में सामने आया है कि प्रसव को आसान बनाने और डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव (ब्लीडिंग) को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला ऑक्सीटोसिन साल्ट का कथित नकली इंजेक्शन ‘टोसिन’ (Tocin) एक बड़े रैकेट का हिस्सा था। इस जानलेवा नकली दवा की सप्लाई केवल राजस्थान के कोटा तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके तार देश की राजधानी नई दिल्ली, मध्य प्रदेश के इंदौर और उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले तक फैले हुए थे।
मामले की संवेदनशीलता और राष्ट्रीय स्तर पर इसके खतरे को देखते हुए राजस्थान सरकार ने संबंधित राज्यों की सरकारों और औषधि नियंत्रण विभागों को तत्काल सूचना भेजकर अलर्ट रहने को कहा है।
दवा निर्माता कंपनी पर कोर्ट केस के आदेश, कोटा का सप्लायर चिन्हित
मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य विभाग के कड़े रुख के बाद राज्य सरकार ने टोसिन इंजेक्शन बनाने वाली कंपनी ‘जैक्सन लेबोरेट्रीज’ (Jackson Laboratories) के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। सरकार ने ड्रग कंट्रोलर को कंपनी के खिलाफ सीधे कोर्ट में आपराधिक मामला दर्ज कराने के आदेश दे दिए हैं।
इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर की गई जांच में यह भी साफ हो गया है कि कोटा के सरकारी अस्पतालों में इस संदिग्ध और बेअसर दवा की सप्लाई ‘राजस्थान मेडिकल हॉल’ के संचालक महेश मित्तल द्वारा की गई थी।
अस्पतालों के वार्डों में मौत बनकर पहुंचे 16 हजार इंजेक्शन
| आपूर्ति की तारीख | कुल मंगाए गए इंजेक्शन | जेके लोन अस्पताल (कोटा) | न्यू मेडिकल कॉलेज (कोटा) |
| 23 फरवरी और 3 मार्च | 16,000 इंजेक्शन | 10,000 इंजेक्शन | 2,479 इंजेक्शन |
जांच रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी और मार्च के भीतर कुल 16 हजार टोसिन इंजेक्शन मंगाए गए थे। इनमें से 10 हजार की भारी खेप कोटा मेडिकल कॉलेज के जेके लोन मातृ एवं शिशु अस्पताल भेजी गई, जबकि 2,479 इंजेक्शन न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल को सप्लाई किए गए थे। आशंका जताई जा रही है कि प्रसव पीड़ा से जूझ रही सैकड़ों महिलाओं को यह बेअसर या नकली इंजेक्शन लगा दिया गया।
एम्स दिल्ली की टीम ने पकड़ी थी नब्ज, विशेषज्ञों की रिपोर्ट का इंतजार
कोटा के जेके लोन अस्पताल में जब प्रसव के दौरान एक के बाद एक पांच महिलाओं की मौत हुई, तो चिकित्सा जगत में हड़कंप मच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), दिल्ली की एक विशेषज्ञ टीम जांच के लिए कोटा पहुंची थी। एम्स की टीम ने मौतों के क्लीनिकल कारणों की जांच करने से पहले डॉक्टरों को डिलीवरी वार्ड में इस्तेमाल की जा रही सभी जीवन रक्षक दवाओं की क्वालिटी और सैंपल्स जांचने की सख्त सलाह दी थी। इसके बाद जब टोसिन इंजेक्शन के नमूनों को लैबोरेट्री टेस्ट के लिए भेजा गया, तो इस बड़े फर्जीवाड़े की कड़ियां खुलीं।
क्या डॉक्टरों के स्तर पर भी हुई लापरवाही?
सहायक औषधि नियंत्रक देवेंद्र गर्ग ने बताया कि ऑक्सीटोसिन एक बेहद संवेदनशील और आवश्यक इंजेक्शन है। यदि प्रसव के बाद ब्लीडिंग कम नहीं हो रही थी और यह इंजेक्शन अपना असर नहीं दिखा पा रहा था, तो ऑन-ड्यूटी डॉक्टरों को तत्काल दवा के प्रभाव का मूल्यांकन करना चाहिए था और मरीज की नाजुक स्थिति को देखते हुए तुरंत वैकल्पिक जीवन रक्षक दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए था।
गर्ग ने स्पष्ट किया कि हालांकि दवा के नकली या सब-स्टैंडर्ड होने की बात प्राथमिक जांच में पुख्ता हो चुकी है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में अस्पताल प्रशासन या डॉक्टरों के स्तर पर किसी भी तरह की विधिक लापरवाही या जिम्मेदारी तय करने का अंतिम फैसला विशेषज्ञ जांच समिति (Expert Committee) की विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद ही किया जाएगा।