सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: ‘अदालती फैसलों की आलोचना करना गलत नहीं, यह जनता का अधिकार है’

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि अदालती फैसलों की स्वस्थ आलोचना करना कहीं से भी गलत नहीं है और यह आम जनता का अधिकार है। अदालत ने एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 8 की पुरानी सामाजिक विज्ञान की किताब से अदालती फैसलों पर की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई से साफ इनकार कर दिया।

सीजेआई की बेंच ने खारिज की याचिका

इस मामले की सुनवाई सीजेआई (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच कर रही थी। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह किसी फैसले के बारे में एक नजरिया है। यह एक स्वस्थ आलोचना है। न्यायपालिका को इस बारे में ज्यादा संवेदनशील क्यों होना चाहिए?” उन्होंने आगे कहा कि किताब यह बताती है कि न्यायपालिका की बनावट कैसी है और वह कैसे काम करती है। किसी भी अदालती फैसले के बारे में लोगों की राय सही या गलत हो सकती है, लेकिन उन्हें आलोचना करने का पूरा अधिकार है।

क्या था पूरा विवाद?

दरअसल, याचिकाकर्ता ने कक्षा 8 की पुरानी सामाजिक विज्ञान की किताब में लिखी एक टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई थी। किताब में लिखा गया था कि ‘हाल के फैसलों में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को शहर में अतिक्रमणकारी के तौर पर देखा जाता है’। अदालत ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अब इस मामले का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि यह विवादित पुस्तक केवल 2015-16 के शैक्षणिक सत्र में ही चलन में थी।

विशेषज्ञ समिति करेगी ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय की समीक्षा

इसी मामले से जुड़े एक अन्य पहलू पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया कि कक्षा 8 की किताब में शामिल ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से जुड़े एक अध्याय की व्यापक समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया गया है। इस उच्च स्तरीय समिति में निम्नलिखित दिग्गज शामिल हैं:

  • पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल
  • पूर्व जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा
  • पूर्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस

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