देश के कुछ राज्यों में सदियों पुरानी ‘नाता प्रथा’ के नाम पर मासूम बेटियों की जिंदगी से जो खिलवाड़ हो रहा है, उसे लेकर अब दिल्ली की संवैधानिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने इस मामले में बेहद सख्त रुख अख्तियार करते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को वह रिपोर्ट सार्वजनिक करने का आदेश दिया है, जिसे अब तक फाइलों में दबाकर रखा गया था। आयोग ने साफ कर दिया है कि परंपरा की आड़ में चल रहे इस ‘मानव तस्करी’ के खेल को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कुप्रथा की आड़ में ‘जिस्म का बाज़ार’ और संगठित सिंडिकेट
कभी समाज में विधवाओं और बेसहारा महिलाओं के पुनर्विवास के लिए शुरू हुई ‘नाता प्रथा’ आज एक खौफनाक व्यापार का रूप ले चुकी है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इस प्रथा के नाम पर नाबालिग लड़कियों की सरेआम खरीद-फरोख्त की जा रही है। जांच में सामने आया है कि इन इलाकों में बाकायदा लड़कियों की ‘बोलियां’ लगती हैं, जहां उनकी उम्र और सुंदरता के हिसाब से कीमत 50 हजार रुपये से शुरू होकर 3 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। यह महज एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध (Organized Crime) बन चुका है।
जब कसाई बन गया पिता: ढाई लाख में अपनी ही लाडली का सौदा
सुनवाई के दौरान सूचना आयोग के सामने एक ऐसा रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला आया, जिसने पूरी व्यवस्था को झकझोर दिया। एक पिता ने अपनी ही नाबालिग बेटी का सौदा महज ढाई लाख रुपये के लालच में कर दिया। ‘नाता प्रथा’ के नाम पर हुए इस सौदे ने साबित कर दिया कि यह कुप्रथा अब उन घरों में भी घुस चुकी है जहां बेटियों को सबसे सुरक्षित होना चाहिए था। सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए साफ लहजे में कहा कि जब तक सरकार की ‘कार्रवाई रिपोर्ट’ (ATR) जनता के सामने नहीं आएगी, तब तक ऐसे दरिंदों के हौसले पस्त नहीं होंगे।
सूचना आयोग का कड़ा प्रहार: अब फाइलों में कैद नहीं रहेगा सच
मंत्रालय अब तक इस मामले में गोपनीयता का हवाला देता रहा है, लेकिन सूचना आयोग ने इस ‘पर्देदारी’ को सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग ने निर्देश दिया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को सौंपी गई अब तक की पूरी रिपोर्ट को सार्वजनिक पटल पर रखा जाए। आयोग का तर्क है कि यह किसी की व्यक्तिगत जानकारी का मामला नहीं, बल्कि ‘जनहित’ से जुड़ा वह गंभीर मुद्दा है जो समाज के माथे पर कलंक की तरह है। अब मंत्रालय को यह बताना होगा कि आखिर उसने इन ‘मंडियों’ को बंद करने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं।
NHRC की दो टूक: पॉक्सो और मानव तस्करी की धाराओं में हो सीधी जेल
इस पूरे मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी अपनी तल्ख राय रखी है। NHRC ने सिफारिश की है कि ‘नाता प्रथा’ के नाम पर होने वाले ऐसे समझौतों को सीधे तौर पर ‘ह्यूमन ट्रैफिकिंग’ की श्रेणी में रखा जाए। आयोग का मानना है कि जो लोग बेटियों का सौदा कर रहे हैं या बिचौलिए की भूमिका निभा रहे हैं, उन पर पॉक्सो (POCSO) और मानव तस्करी की संगीन धाराओं के तहत मामला दर्ज होना चाहिए। एक्सपोज नाउ का स्पष्ट मानना है कि जब तक कानून का डंडा इन ‘सफेदपोश’ खरीदारों पर नहीं चलेगा, तब तक बेटियों की नीलामी का यह बाज़ार बंद नहीं होगा।