ठाकुर रोशन सिंह जयंती: काकोरी कांड का वो महानायक, जिसकी फांसी से पहले की मुस्कान देख जेलर भी रो पड़ा था

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Thakur Raushan Singh: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी गूंज आज भी युवाओं की रगों में दौड़ते खून में सुनाई देती है। ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी थे ठाकुर रोशन सिंह, जिनकी आज (22 जनवरी) जयंती है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के नबादा गांव में हुआ था। वे उन क्रांतिकारियों में से थे जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की आंखों में आंखें डालकर बात की और देश के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

काकोरी एक्शन से हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत

रोशन सिंह का नाम इतिहास के पन्नों में काकोरी ट्रेन एक्शन (9 अगस्त 1925) के लिए सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और राजेंद्र लाहिड़ी के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजों के खजाने को लूटकर यह संदेश दिया था कि भारतीय अब चुप नहीं बैठेंगे। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। रोशन सिंह एक अचूक निशानेबाज थे और युवाओं को सशस्त्र क्रांति के लिए संगठित करने में उनकी भूमिका अहम थी।

जेल से लिखा वो आखिरी खत

फांसी से कुछ दिन पहले रोशन सिंह ने जेल से अपने परिवार को एक खत लिखा था, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने लिखा था: “इस सप्ताह के भीतर ही मेरी फांसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह आपको मोहब्बत का बदला दे। आप मेरे लिए रंज (दुख) न करें। मेरी मौत खुशी का बाइस (कारण) होगी।

दुनिया में पैदा होकर मरना ही है, फिर अफसोस क्या… जिंदगी जिंदादिली को जान ए रोशन, वरना कितने ही यहां रोज फना होते हैं।”

गीता हाथ में लेकर चढ़े थे फांसी पर

19 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की मलाका जेल में उन्हें फांसी दी गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, फांसी के तख्ते की ओर जाते समय रोशन सिंह के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उनके हाथ में गीता थी और जुबान पर ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष। उनकी मुस्कान और निडरता देखकर वहां मौजूद जेलर की आंखों में भी आंसू आ गए थे।

आज उनकी जयंती पर पूरा देश इस वीर सपूत को नमन कर रहा है। ठाकुर रोशन सिंह का जीवन सिखाता है कि राष्ट्ररक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं है।

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