गवरी नृत्य के बारे में रोचक बातें…Facts About Gavari Dance in Hindi

राजस्थान की संस्कृति अपने रंगों और उत्सवों के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है, लेकिन मेवाड़ के आदिवासी अंचल में एक ऐसा पर्व मनाया जाता है जो केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक कठोर तपस्या है। हम बात कर रहे हैं भील जनजाति के प्रसिद्ध लोक अनुष्ठान ‘गवरी’ (Gavari) की।

यह एक अर्ध-संगीत और नाटकीय रूप से प्रदर्शित धार्मिक अनुष्ठान है, जो रक्षाबंधन के दूसरे दिन से शुरू होकर सवा महीने (लगभग 40 दिन) तक चलता है। सावन-भादो माह में होने वाले इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न करना है।

क्या है ‘गवरी’ और इसका पौराणिक महत्व? ‘गवरी’ शब्द भगवान शिव की पत्नी ‘गौरी’ का ही एक लोक-अपभ्रंश (विकृत) नाम है। इस नृत्य-नाटिका का मूल आधार शिव और भस्मासुर की पौराणिक कथा है।

  • इस अनुष्ठान में भगवान शिव को ‘पुरिया’ कहा जाता है।
  • इसमें चार तरह के पात्र मुख्य रूप से होते हैं— देवता, मनुष्य, राक्षस और पशु।
  • इन नाटकों के माध्यम से पौराणिक कथाएं प्रस्तुत की जाती हैं, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती हैं।

40 दिन की कठोर तपस्या: न घर जाना, न हरी सब्जी खाना गवरी केवल एक नृत्य नहीं है, बल्कि यह आस्था की एक कठिन परीक्षा है। इस अनुष्ठान में भाग लेने वाले भील पुरुष 40 दिनों तक अत्यंत कठोर नियमों का पालन करते हैं:

  1. घर त्याग: गवरी खेलने वाले लोग 40 दिनों तक अपने घर नहीं जाते।
  2. भोजन के नियम: इस दौरान वे मांस, मदिरा और यहां तक कि हरी साग-सब्जी का भी सेवन नहीं करते। वे दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं।
  3. नंगे पैर यात्रा: ये लोग एक गांव से दूसरे गांव मीलों का सफर बिना जूते-चप्पल के (नंगे पैर) तय करते हैं।

केवल पुरुष निभाते हैं सारे किरदार गवरी नृत्य की एक और खास बात यह है कि इसे केवल पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। नाटिका में यदि किसी महिला पात्र की आवश्यकता होती है, तो पुरुष ही महिलाओं की वेशभूषा धारण कर उस किरदार को निभाते हैं। यह नृत्य एक वृत्त (गोले) में समूह बनाकर किया जाता है।

बेटी के ससुराल में गवरी का मंचन यह पर्व सामाजिक सौहार्द का भी प्रतीक है। परंपरा के अनुसार, एक गांव के भील अपनी गवरी लेकर उन्हीं गांवों में जाते हैं, जहाँ उनके गांव की बेटी ब्याही गई हो (बेटी का ससुराल)। वहाँ वे नृत्य करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

‘राई नृत्य’ और समापन गवरी में मांदल (एक प्रकार का ढोल) और थाली वाद्ययंत्रों का विशेष प्रयोग होता है, जिसके कारण इसे ‘राई नृत्य’ (Rai Dance) के नाम से भी जाना जाता है। सवा महीने तक चलने वाले इस उत्सव के आखिरी दिन को ‘गड़ावण-वळावण’ (Gadavan-Valavan) कहा जाता है। इस दिन विसर्जन के साथ गवरी का समापन होता है और कलाकार अपने सामान्य जीवन में लौटते हैं।

मेवाड़ की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी भील समाज ने इसे पूरी शिद्दत के साथ जीवित रखा है।

Gavari Dance Video – गवरी नृत्य वीडियो

Live Sach – तेज़, भरोसेमंद हिंदी समाचार। आज की राजनीति, राजस्थान से ब्रेकिंग न्यूज़, मनोरंजन, खेल और भारतदुनिया की हर बड़ी खबर!

Share This Article