मरुधरा की थाली में धीरे-धीरे घुल रहा है धीमा जहर; जेएलएन अस्पताल में हर महीने 60 से अधिक मरीजों की हो रही कीमोथेरेपी

Madhu Manjhi

नागौर। राजस्थान का प्रमुख कृषि प्रधान जिला नागौर अब एक बेहद खौफनाक और अदृश्य स्वास्थ्य चुनौती के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। कभी अपनी उन्नत खेती और पशुपालन के लिए विख्यात इस जिले में पिछले कुछ वर्षों के भीतर कैंसर के मरीजों की संख्या में अप्रत्याशित और विधिक रूप से डराने वाली तेजी दर्ज की गई है। चिकित्सा विशेषज्ञों ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि जिस तरह पंजाब के मालवा क्षेत्र और राजस्थान के सीमावर्ती श्रीगंगानगर जिले को पेस्टीसाइड्स के अत्यधिक उपयोग के कारण ‘कैंसर बेल्ट’ माना जाता है, ठीक उसी तरह के डराने वाले विधिक संकेत अब नागौर जिले में भी दिखाई देने लगे हैं।

हालात इस कदर चिंताजनक हो चुके हैं कि नागौर के जवाहरलाल नेहरू (JLN) जिला अस्पताल में ही हर महीने 60 से अधिक कैंसर रोगियों की कीमोथेरेपी की जा रही है, जबकि औसतन हर माह 5 से 7 नए चिन्हित मरीज अस्पताल की विधिक दहलीज पर पहुंच रहे हैं। इसके अतिरिक्त सैकड़ों ऐसे मरीज भी हैं, जो बेहतर और बड़े इलाज के लिए बीकानेर के पीबीएम या जोधपुर और जयपुर के सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं।

थाली में परोसा जा रहा मौत का सामान: कीटनाशकों और एंटीबायोटिक का कहर

इस महा-संकट के पीछे कोई प्राकृतिक कारण नहीं, बल्कि इंसानी लालच और वैज्ञानिक नियमों की सरेआम अनदेखी है:

  • अंधाधुंध पेस्टीसाइड्स का छिड़काव: अधिक मुनाफे और फसलों को कीड़ों से बचाने के चक्कर में किसान खेतों में बिना किसी विधिक ट्रेनिंग के जानलेवा कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। यह केमिकल मिट्टी के जरिए अनाज, सब्जियों और भूजल में विधिक रूप से प्रवेश कर रहा है।
  • दूध और मांस में ड्रग्स का जहर: पशुपालन के क्षेत्र में भी बड़ा खेल चल रहा है। दुधारू पशुओं से अधिक दूध निकालने और मुर्गियों व बकरों का वजन तेजी से बढ़ाने के लिए उन्हें भारी मात्रा में प्रतिबंधित और अनियंत्रित एंटीबायोटिक (Antibiotics) व हार्मोनल दवाएं दी जा रही हैं। जब इंसान इस दूध और मांस का सेवन करता है, तो यह जहर सीधे उसके शरीर में जाकर कैंसर कोशिकाओं (Cancer Cells) को ट्रिगर कर देता है।

कैंसर का वर्गीकरण: पुरुषों और महिलाओं पर अलग-अलग विधिक प्रहार

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, दूषित खान-पान और खराब जीवनशैली के कारण स्त्री और पुरुष दोनों ही वर्ग इस विधिक बीमारी की चपेट में आ रहे हैं, जिसका सांख्यिकीय और विधागत विवरण इस प्रकार है:

लक्षित वर्गसर्वाधिक पाए जाने वाले कैंसर के प्रकारमुख्य स्थानीय एवं विधिक कारण
पुरुष (Males)मुंह, गला और फेफड़ों (Lungs) का कैंसरतंबाकू, बीड़ी-गुटखे का अत्यधिक सेवन और कीटनाशकों का सीधा एक्सपोजर
महिलाएं (Females)स्तन (Breast), सर्वाइकल (बच्चादानी का मुंह) और ओवेरियन कैंसरमिलावटी प्रोसेस्ड फूड, केमिकल युक्त खान-पान और हार्मोनल असंतुलन

ग्रामीण इलाकों में जागरूकता का अभाव; अंतिम चरण में पहुंच रहे मरीज

जेएलएन अस्पताल के जिला नोडल अधिकारी (कैंसर) डॉ. दिनेश मिश्रा ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में तंबाकू, गुटखे और बीड़ी का सेवन अत्यधिक होने तथा प्राथमिक लक्षणों के प्रति घोर लापरवाही बरतने के कारण स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। अधिकांश ग्रामीण मरीज डॉक्टरों के पास तब पहुंचते हैं, जब उनका कैंसर तीसरे या अंतिम विधिक चरण (Last Stage) में प्रवेश कर चुका होता है। ऐसी स्थिति में चिकित्सा प्रक्रिया जटिल और महंगी हो जाती है, जिससे मरीज को बचाना डॉक्टरों के लिए एक बड़ी विधिक चुनौती साबित होता है।

राहत की बात: स्थानीय स्तर पर निशुल्क कीमोथेरेपी की विधिक सुविधा

इस भयावह दौर के बीच नागौर के मरीजों के लिए एकमात्र विधिक राहत की बात यह है कि जेएलएन अस्पताल में कैंसर रोगियों के लिए एक विशेष वार्ड पूरी तरह समर्पित रूप से संचालित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री निःशुल्क दवा और जांच योजना के अंतर्गत यहां पिछले काफी समय से कीमोथेरेपी और अन्य आवश्यक उपचार विधिक रूप से पूरी तरह मुफ्त उपलब्ध कराए जा रहे हैं। पूर्व में जहां गरीब मरीजों को एक-एक कीमोथेरेपी के चक्र के लिए हजारों रुपए खर्च कर बीकानेर, जोधपुर, अजमेर या जयपुर भागना पड़ता था, वहीं अब स्थानीय स्तर पर यह विधिक सुविधा मिलने से उनके समय और जीवनभर की गाढ़ी कमाई, दोनों की बड़ी बचत हो रही है।

डॉक्टरों का परामर्श: 40 की उम्र पार करते ही कराएं विधिक स्क्रीनिंग

कैंसर विज्ञानियों का साफ कहना है कि इस बीमारी से डरने के बजाय समय रहते जागरूकता और विधिक स्क्रीनिंग (Screening) ही सबसे अचूक हथियार है। डॉक्टरों ने महिलाओं को हर माह स्वयं स्तन परीक्षण (Self-Breast Examination) करने तथा 40 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को वर्ष में एक बार कैंसर स्क्रीनिंग टेस्ट करवाने की विधिक सलाह दी है। यदि समय रहते शरीर में आ रहे अवांछित बदलावों जैसे— बिना दर्द के गांठ होना, आवाज का लगातार भारी होना या लंबे समय तक छाला ठीक न होना, जैसे लक्षणों को पहचान लिया जाए, तो कैंसर का सौ प्रतिशत सफल इलाज विधिक रूप से संभव है।

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