जवाबदेही तय:”एनसीआर से लाभ के नाम पर मिला शून्य, सरकार तुरंत दोनों जिलों को बोर्ड से बाहर निकाले”

Madhu Manjhi

भरतपुर। राजस्थान के पूर्वी सिंहद्वार कहे जाने वाले भरतपुर और औद्योगिक गढ़ अलवर जिले के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) का तमगा अब विकास का इंजन बनने के बजाय एक बड़ा ‘विधिक और प्रशासनिक चक्रव्यूह’ बन चुका है। केंद्र सरकार द्वारा एनसीआर की सीमा को दिल्ली के राजघाट से महज 100 किलोमीटर के दायरे तक सीमित करने का प्रस्ताव पिछले पांच वर्षों से सरकारी फाइलों में धूल फांक रहा है। केंद्र और राज्य दोनों ही जगह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार होने के बावजूद इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव की अंतिम अधिसूचना (Final Notification) अब तक जारी नहीं हो सकी है। इसके परिणामस्वरूप, दिल्ली के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बनाई गई कड़ी गाइडलाइंस और पाबंदियों का सीधा मारक असर भरतपुर और अलवर के स्थानीय विकास कार्यों, रियल एस्टेट और उद्योग-धंधों पर पड़ रहा है।

राजघाट से 100 KM का फॉर्मूला: मास्टर प्लान 2041 का पूरा गणित

गौरतलब है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के तहत फिलहाल तीन राज्यों के कुल 22 जिले आते हैं, जिनमें हरियाणा के 13, उत्तर प्रदेश के सात और राजस्थान के दो जिले (अलवर और भरतपुर) शामिल हैं। बढ़ते जनसंख्या दबाव और विसंगतियों को देखते हुए, एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ने 17 दिसंबर 2021 को ‘मास्टर प्लान-2041’ का ड्राफ्ट मंजूर किया था। इस ड्राफ्ट में केंद्र सरकार ने एक वैज्ञानिक पैमाना तय किया था कि दिल्ली के राजघाट से हवाई दूरी (Aerial Distance) के आधार पर केवल 100 किलोमीटर तक का क्षेत्र ही एनसीआर का हिस्सा रहेगा, जो मुख्य रूप से यूपी के मेरठ तक ही सीमित होता है। यदि इस विधिक आदेश की अंतिम अधिसूचना जारी हो जाती है, तो दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर से अधिक दूर स्थित भरतपुर और अलवर जिले स्वतः ही एनसीआर के इस जटिल दायरे से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे।

वर्ष 1991 और 2013 के वे बड़े सपने, जो ‘कागजी दावों’ में ही सिमट गए

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का मूल विचार वर्ष 1985 के अधिनियम के तहत 1991 में धरातल पर क्रियान्वित किया गया था। जनसंख्या के दबाव को दिल्ली से हटाने के लिए वर्ष 1991 में अलवर को और बाद में 1 जुलाई 2013 को भरतपुर को इस क्षेत्र में शामिल किया गया था। उस समय स्थानीय जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे कि दिल्ली के बड़े सरकारी कार्यालय, अनुसंधान केंद्र और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) को यहाँ स्थानांतरित किया जाएगा। दशकों के भीतर यहाँ एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (Airport) और रैपिड मेट्रो जैसी कनेक्टिविटी विकसित होगी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दशकों बीतने के बाद भी एक भी बड़ा सरकारी कार्यालय भरतपुर नहीं आया और जिला किसी भी बड़ी महत्वाकांक्षी केंद्रीय योजना से अछूता ही रह गया।

एनसीआर (NCR) में रहने से भरतपुर-अलवर को हो रहे 5 बड़े नुकसान

स्थानीय आर्थिक विशेषज्ञों और व्यापार मंडलों के अनुसार, एनसीआर के कड़े पर्यावरण नियमों के कारण दोनों जिलों को निम्नलिखित मोर्चों पर भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है:

  • वाहनों पर कड़ा प्रतिबंध: दिल्ली-एनसीआर की गाइडलाइंस के कारण भरतपुर में आतिशबाजी और प्रदूषण फैलाने वाले पुराने मानक (BS-1, BS-2, BS-3) के यात्री और वाणिज्यिक वाहनों के संचालन पर पूरी तरह पाबंदी है। दिल्ली के प्रदूषण के कारण यहाँ स्थानीय लोगों के वाहनों की समय-सीमा जबरन घटा दी गई है।
  • निर्माण और खनन पर बार-बार ब्रेक: सर्दी के मौसम में जब दिल्ली-एनसीआर में ‘ग्रेडेड रेस्पॉन्स एक्शन प्लान’ (GRAP) लागू होता है, तो हवा के रुख और प्रदूषण के नाम पर भरतपुर-अलवर में भी वैध खनन, क्रशर और निर्माण (Construction) गतिविधियों पर हफ्तों के लिए रोक लगा दी जाती है, जिससे दिहाड़ी मजदूरों के सामने संकट खड़ा हो जाता है।
  • सरसों तेल उद्योग की तालाबंदी: भरतपुर देश में सरसों तेल (Mustard Oil) उत्पादन का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। लेकिन एनसीआर के कड़े ‘कलर कोडिंग’ और एनवायरनमेंट क्लियरेंस नियमों के कारण नई सरसों तेल मिलों और फैक्ट्रियों को प्रदूषण नियंत्रण मंडल से एनओसी (NOC) नहीं मिल पा रही है।
  • औद्योगिक निवेश में गिरावट: कठोर विधिक और ग्रीन नियमों के कारण रीको (RIICO) द्वारा नए औद्योगिक क्षेत्रों का विकास नहीं किया जा रहा है, जिससे निवेशक उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश की सीमाओं की तरफ पलायन कर रहे हैं।
  • महंगा ईंधन: एनसीआर जोन के टैक्स और ग्रीन सेस के कारण स्थानीय स्तर पर पेट्रोल और डीजल की दरें पड़ोसी गैर-एनसीआर क्षेत्रों की तुलना में काफी महंगी हैं।

विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों के पक्ष (Expert & Political Statements)

“डबल इंजन सरकार का लाभ उठाकर तुरंत बाहर निकले राजस्थान” > “वर्ष 2021 में ही केंद्र सरकार की उच्च स्तरीय कमेटी और बोर्ड के नामित सदस्यों के साथ हुई बैठक में भरतपुर-अलवर को बाहर करने का यह प्रस्ताव विधिक रूप से स्वीकृत किया जा चुका है। अब जब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार है, तो मुख्यमंत्री को इस लाभ का उपयोग करते हुए तुरंत अंतिम नोटिफिकेशन जारी करवाना चाहिए। जब से भरतपुर एनसीआर में गया है, यहाँ एक भी नई बड़ी फैक्ट्री नहीं लग पाई है। इस व्यवस्था से हमें लाभ के नाम पर सिर्फ पाबंदियां मिली हैं।”

डॉ. सुभाष गर्ग, विधायक, भरतपुर

“व्यापारियों के लिए एनसीआर अब एक अभिशाप है” > “भरतपुर जिले को जितनी जल्दी हो सके एनसीआर से बाहर करने में ही यहाँ के व्यापारियों और युवाओं का फायदा है। अब तक हमें इसका एक प्रतिशत भी आर्थिक लाभ नहीं मिला, बल्कि दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने पर फैक्ट्रियां यहाँ बंद करा दी जाती हैं। हमारे फलते-फूलते उद्योगों की कमर टूट चुकी है।”

कृष्ण कुमार अग्रवाल, पूर्व अध्यक्ष, चेम्बर ऑफ कॉमर्स

प्रशासनिक टिप्पणी: जोनल प्लान पर मांगी गई थी रिपोर्ट

स्थानीय जिला प्रशासन के सूत्रों के अनुसार, कुछ समय पहले एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ने भविष्य के ‘जोनल डेवलपमेंट प्लान’ के संबंध में राज्य सरकार से तकनीकी टिप्पणी मांगी थी। इसके जवाब में स्थानीय प्रशासन ने उद्योगों के विकास के लिए नए सेक्टर्स, सुदृढ़ लिंक-वे और ग्रीन कॉरिडोर जैसी विधिक सुविधाएं शामिल करने का प्रस्ताव भेजा था। हालांकि, सीमा को घटाकर 100 किलोमीटर करने की अंतिम फाइल अभी भी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और पीएमओ (PMO) के स्तर पर अंतिम विधिक स्वीकृति के लिए प्रतीक्षारत है।

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