राजस्थान के डूंगरपुर जिले में राजकीय विद्यालयों में मिड-डे मील सामग्री परिवहन के लिए जारी किए गए एक टेंडर में नियमों को ताक पर रखकर गंभीर गड़बड़झाला किए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। टेंडर प्रक्रिया के दौरान दो अलग-अलग स्वतंत्र फर्मों द्वारा एक ही कार्य अनुभव प्रमाण पत्र (Experience Certificate) को अपने-अपने दस्तावेजों के साथ संलग्न कर जमा कराने की बड़ी विसंगति उजागर हुई है। इतना ही नहीं, इस गंभीर गड़बड़ी की लिखित शिकायत के बावजूद उपापन समिति द्वारा महज आधे घंटे के भीतर वित्तीय निविदा खोलकर वर्क ऑर्डर भी जारी कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने रसद विभाग की उपापन समिति की कार्यप्रणाली, निष्पक्षता और पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक ही काम के दो अनुभव प्रमाण पत्र, आरटीपीपी नियमों की अनदेखी
डूंगरपुर रसद विभाग की ओर से 17 अप्रैल को मिड-डे मील परिवहन को लेकर टेंडर आमंत्रित किए गए थे, जिसमें 6 फर्मों ने हिस्सा लिया था। 28 अप्रैल को तकनीकी निविदा खोली गई, जिसमें उपापन समिति ने ‘निवेदिता ट्रेडर्स’ के साथ-साथ ‘गजानन ट्रांसपोर्ट’ और ‘डूंगरपुर केवीएसएस’ को भी पात्र घोषित कर दिया।
शिकायतकर्ता फर्म ‘निवेदिता ट्रेडर्स’ के प्रतिनिधि ललित कुमार ने साक्ष्यों के साथ जिला कलेक्टर व जिला रसद अधिकारी को आपत्ति दर्ज कराई है। शिकायत के अनुसार, रसद विभाग ने वर्ष 2025-26 में डूंगरपुर केवीएसएस को पीडीएस (PDS) वितरण का अस्थायी कार्य सौंपा था, जिसके आधार पर जिला रसद अधिकारी ने डूंगरपुर केवीएसएस को अनुभव प्रमाण पत्र जारी किया। लेकिन, डूंगरपुर केवीएसएस ने इसी मूल कार्य का एक अन्य अनुभव प्रमाण पत्र निजी फर्म ‘गजानन ट्रांसपोर्ट’ को भी जारी कर दिया। इसके बाद दोनों फर्मों ने एक ही कार्य के आधार पर बने अलग-अलग अनुभव प्रमाण पत्रों का उपयोग करते हुए इस सरकारी टेंडर में अपनी पात्रता का दावा पेश कर दिया, जो पूरी तरह नियम विरुद्ध है।
क्या कहते हैं सरकारी खरीद के नियम?
राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता (RTPP) अधिनियम-2012 और नियम-2013 के जानकारों के अनुसार, किसी एक ही कार्य के अनुभव प्रमाण पत्र का उपयोग दो अलग-अलग स्वतंत्र फर्में अपनी पात्रता साबित करने के लिए नहीं कर सकतीं। इसकी अनुमति केवल उस स्थिति में होती है जब संबंधित कार्य दोनों पक्षों द्वारा संयुक्त उपक्रम (जॉइंट वेंचर) के रूप में किया गया हो। इस मामले में ऐसा कोई संयुक्त उपक्रम मौजूद नहीं था।
इसके अलावा, टेंडर की शर्त संख्या 31 के अनुसार कार्य को किसी तीसरे पक्ष को सब-लेट (Sub-let) करना पूर्णतः प्रतिबंधित था। इसके बावजूद मूल कार्य को किसी अन्य निजी फर्म को सौंपे जाने और उसके आधार पर प्रमाण पत्र जारी होने से वित्तीय और कानूनी नियमों के उल्लंघन की आशंका और गहरा गई है।
तकनीकी जांच पर उठे सवाल, आधे घंटे में जारी हुआ वर्क ऑर्डर
शिकायतकर्ता का आरोप है कि तकनीकी बिड के मूल्यांकन के दौरान उपापन समिति को दस्तावेजों की गहन जांच करनी चाहिए थी, लेकिन इस विसंगति को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। इस संबंध में 18 मई को ही उपापन समिति के अध्यक्ष, जिला कलेक्टर और जिला रसद अधिकारी को लिखित शिकायत सौंप दी गई थी।
इसके बावजूद शिकायत की जांच करने या निविदा को स्थगित करने के बजाय 27 मई को वित्तीय निविदा (Financial Bid) खोल दी गई। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि वित्तीय निविदा खुलने के महज आधे घंटे के भीतर ही संबंधित फर्म के पक्ष में वर्क ऑर्डर भी जारी कर दिया गया। इतनी बिजली की तेजी से की गई प्रशासनिक कार्रवाई सीधे तौर पर किसी विशेष फर्म को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य की ओर इशारा करती है।
जिला रसद अधिकारी बोले- “होगी कड़ी जांच”
पूर्व में की गई आपत्ति पर कोई सुनवाई नहीं होने और आनन-फानन में जारी किए गए वर्क ऑर्डर के बाद पीड़ित फर्म ने दोबारा जिला कलेक्टर और रसद विभाग का दरवाजा खटखटाया है। पूरे मामले को लेकर डूंगरपुर के जिला रसद अधिकारी (DSO) महेश चन्द्र शर्मा ने कहा:
“एक फर्म द्वारा टेंडर प्रक्रिया के संबंध में गंभीर आपत्ति दर्ज कराई गई है। हमारे पास शिकायत और उससे जुड़े दस्तावेज आ चुके हैं। पूरे मामले की गहनता से तकनीकी और कानूनी जांच कराई जाएगी। जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके आधार पर नियमों के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
फिलहाल, मिड-डे मील परिवहन टेंडर में सब-लेटिंग के आरोप, एक ही अनुभव प्रमाण पत्र का दोहरा उपयोग और तकनीकी मूल्यांकन में बरती गई कथित लापरवाही ने सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। अब सभी की नजरें विभागीय जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं।