जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश में सदियों से पैर पसारे बैठी ‘अट्टा-सट्टा’ (लड़कियों की अदला-बदली) और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं पर बेहद कड़ा प्रहार करते हुए एक युगांतकारी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि बेटियों को पारिवारिक समझौतों, वित्तीय लाभ या किसी भी तरह के लेन-देन का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। ऐसी दकियानूसी प्रथाएं न केवल भारत के संविधान और बाल अधिकारों के खिलाफ हैं, बल्कि यह महिला की गरिमा और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी सीधा हनन हैं।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) के पुराने फैसले को पूरी तरह पलटते हुए पीड़ित महिला की तलाक की अर्जी को मंजूरी दे दी। अदालत ने माना कि भारतीय समाज में महिलाएं सामाजिक लोकलाज और आर्थिक निर्भरता के कारण लंबे समय तक ससुराल में अत्याचार सहने को मजबूर रहती हैं, जिसे उनकी ‘सहमति’ नहीं माना जा सकता।
फैमिली कोर्ट की बड़ी चूक को हाईकोर्ट ने सुधारा
यह पूरा मामला तब चर्चा में आया जब एक पीड़ित पत्नी ने निचली अदालत (फैमिली कोर्ट) के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। दरअसल, फैमिली कोर्ट ने महिला की तलाक की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वह शादी के बाद कई सालों तक ससुराल में रही, इसलिए उसके द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोप बेबुनियाद हैं और उसने केवल पारिवारिक मनमुटाव के चलते स्वेच्छा से ससुराल छोड़ा था।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के इस निष्कर्ष को पूरी तरह दोषपूर्ण और संवेदनहीन माना। खंडपीठ ने कहा:
“फैमिली कोर्ट ने अट्टा-सट्टा प्रथा से उपजे विवाद और महिला के साथ हुई वैवाहिक क्रूरता को एक साथ मिलाकर देखने में गंभीर कानूनी चूक की। कोई महिला यदि लंबे समय तक ससुराल का टॉर्चर बर्दाश्त कर रही है, तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं निकाला जा सकता कि उसके साथ अत्याचार नहीं हो रहा था। भारत के सामाजिक ताने-बाने में आज भी कई महिलाएं केवल सामाजिक दबाव, लोकलाज, आर्थिक लाचारी और बच्चों के भविष्य को देखकर चुपचाप प्रताड़ना सहती रहती हैं।”
केस फाइल: दहेज प्रताड़ना और आपराधिक चार्जशीट
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, पीड़ित महिला ने अपने पति और ससुराल वालों पर शादी के तुरंत बाद से ही गंभीर शारीरिक और मानसिक क्रूरता के आरोप लगाए थे।
- मांग: ससुराल पक्ष द्वारा लगातार महंगी मोटरसाइकिल और सोने के आभूषणों की अवैध मांग (दहेज) की जा रही थी।
- कानूनी कार्रवाई: प्रताड़ना से तंग आकर महिला ने महिला पुलिस थाना, बीकानेर में एक आपराधिक एफआईआर दर्ज करवाई थी। पुलिस ने गहन तफ्तीश के बाद पति और ससुर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की प्रासंगिक धाराओं के तहत अदालत में पुख्ता चार्जशीट भी पेश कर दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने वैवाहिक क्रूरता का एक बड़ा और मजबूत आधार माना।
अट्टा-सट्टा प्रथा पर हाईकोर्ट की तल्ख और ऐतिहासिक टिप्पणियां
| कुप्रथा का स्वरूप | हाईकोर्ट का विधिक दृष्टिकोण | समाज को कड़ा संदेश |
| मानव जीवन का आदान-प्रदान | अट्टा-सट्टा वास्तव में लड़कियों की मर्जी और उनकी आजादी को पूरी तरह समाप्त कर देने वाली एक अमानवीय व्यवस्था है। | महिलाओं को किसी वस्तु की तरह ट्रीट करना बंद होना चाहिए। |
| शादी की ‘गारंटी’ का भ्रम | खंडपीठ ने दो टूक कहा कि एक घर की बेटी, दूसरे घर के बेटे की शादी कराने की ‘गारंटी’ या ‘जमानत’ नहीं हो सकती। | विवाह दो व्यक्तियों का पवित्र बंधन है, न कि कोई कमर्शियल डील। |
हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले के जरिए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को भी अप्रत्यक्ष संदेश दिया है कि ग्रामीण इलाकों में आज भी छिपकर होने वाले बाल विवाह और अट्टा-सट्टा जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ कानून का कड़ाई से पालन करवाया जाए, ताकि किसी भी बेटी को अपनी जिंदगी समझौते की वेदी पर न चढ़ानी पड़े।