1962 हेल्पलाइन सुविधा खुद ही बीमार: बीमार भैंस के इलाज के लिए तड़पते रहे पशुपालक, वैन से नदारद मिले मेडिकल स्टाफ

Madhu Manjhi

जयपुर। ग्रामीण अंचलों में मूक मवेशियों के त्वरित और मुफ्त इलाज के लिए शुरू की गई महत्वाकांक्षी ‘मोबाइल पशु चिकित्सा इकाई’ (Mobile Veterinary Unit – MVU) योजना में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े और गंभीर वित्तीय अनियमितताओं का सनसनीखेज मामला सामने आया है। पूरे प्रदेश में संचालित हो रही 536 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों के नाम पर हर महीने करीब 9.48 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट ठिकाने लगाया जा रहा है, लेकिन धरातल पर पशुपालकों को इसका कोई वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा है।

सच्चाई यह है कि जिला स्तरीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत से बिना किसी ठोस सबूत (जैसे जियो टैगिंग या डॉक्टर की उपस्थिति) के हर महीने फर्जी बिल बनाकर विभाग को पेश किए जा रहे हैं और सरकार की तिजोरी को चूना लगाया जा रहा है।

1.77 लाख रुपये प्रति माह में ‘दवा और डॉक्टर’ दोनों लापता

न फोटो, न वीडियो, न ही जियो टैगिंग

नियमों के मुताबिक, अनुबंधित फर्म द्वारा जिस भी बीमार पशु का उपचार किया जाता है, उसकी लाइव फोटो, वीडियो और सबसे महत्वपूर्ण जियो टैगिंग (Geo-Tagging) होना अनिवार्य है ताकि वैन की सही लोकेशन का पता चल सके। लेकिन हकीकत यह है कि किसी भी वैन के पास इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। ऐसे में यह साबित करना नामुमकिन है कि वैन वास्तव में मौके पर गई भी थी या नहीं।

नागौर जिले की बात करें तो यहाँ कुल 13 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयां संचालित हैं। प्रत्येक वैन के बदले सरकार द्वारा प्रति माह 1.77 लाख रुपये का भुगतान अनुबंधित फर्म को किया जाता है। इस राशि में एक क्वालिफाइड डॉक्टर, एक वैन चालक, आवश्यक दवाइयां और वाहन का ईंधन शामिल है। नियम यह भी है कि यदि किसी दिन डॉक्टर या चालक अनुपस्थित रहता है, तो उस दिन का भुगतान काटा जाना चाहिए, लेकिन यहाँ कागजों में सभी 13 वैनों में चिकित्सकों की शत-प्रतिशत उपस्थिति दिखाई जा रही है।

ग्राउंड जीरो की हकीकत: ‘1962’ सुविधा खुद ही बीमार

पशुपालकों से बात करने पर इस योजना की जो कड़वी सच्चाई सामने आई है, वह बेहद चौंकाने वाली है:

गांव और पशुपालकशिकायत और जमीनी हकीकत
1. खजवाना (पशुपालक सुरेश जाखड़)दोपहर 1:50 बजे भैंस के इलाज के लिए हेल्पलाइन नंबर 1962 पर कॉल किया। वैन शाम 5 बजे पहुंची, लेकिन गाड़ी में कोई पशु चिकित्सक नहीं था। तीन युवक आए, जिन्होंने खुद को वेटरनरी छात्र बताया और बिना पूरी जानकारी के एक खुली हुई टैबलेट (दवा) देकर चले गए।
2. गांव इंदास (पशुपालक प्रकाश पूनिया)दोपहर सवा 3 बजे हेल्पलाइन पर कॉल किया। महिला कर्मचारी ने जानकारी ली और इंतजार करने को कहा। बाद में एक युवक ने फोन कर दोबारा पशु के बारे में जानकारी मांगी और अंत में कह दिया—“आज गाड़ी नहीं आ सकती, आप मंगलवार को फोन करना।”
3. गांव बू-नरावताइस गांव में तो हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराने के बावजूद वैन पहुंची ही नहीं और पशुपालक निजी डॉक्टरों को मोटी रकम देने पर मजबूर हुए।

विधानसभा में उठ चुका है मुद्दा, जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती

इस योजना की वास्तविकता और लग रहे गंभीर आरोपों को लेकर पूर्व में विधानसभा में भी विधायकों द्वारा सवाल पूछे जा चुके हैं। तारांकित सवाल के माध्यम से सदन में इस पर जवाब मांगा गया था, लेकिन विभाग के पास अब तक इसका कोई स्पष्ट और संतोषजनक उत्तर नहीं है।

संयुक्त निदेशक का बयान:

पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. महेश मीणा ने बताया कि अनुबंधित फर्म को हर हाल में डॉक्टर और दवाओं की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होती है। अनुपस्थिति मिलने पर फर्म के भुगतान में कटौती का प्रावधान है। सोमवार को औचक मिलान के निर्देश दिए गए हैं।

पशुपालकों का आरोप है कि अनुबंधित फर्म बिना पूरा इलाज किए केवल अपनी गाड़ियों का किलोमीटर बढ़ाने और फर्जी आंकड़े जुटाने में लगी है, ताकि हर महीने करोड़ों रुपये का भुगतान उठाया जा स

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