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Home - जयपुर - “1952 से नहीं, 1913 में ही पड़ गई थी जनप्रतिनिधित्व की नींव”—महाराजा गंगासिंह की प्रतिनिधि सभा को राज्यपाल ने किया याद

“1952 से नहीं, 1913 में ही पड़ गई थी जनप्रतिनिधित्व की नींव”—महाराजा गंगासिंह की प्रतिनिधि सभा को राज्यपाल ने किया याद

Madhu Manjhi
Madhu Manjhi
May 18, 2026
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जयपुर। राजस्थान की लोकतांत्रिक यात्रा और संसदीय इतिहास में आज का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया है। राजस्थान विधानसभा के गठन के 75 वर्ष पूर्ण होने (अमृत महोत्सव) के ऐतिहासिक अवसर पर सोमवार को ‘अमृत महोत्सव उद्घोष’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस भव्य समारोह में राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने विधानसभा के नवनिर्मित आधिकारिक प्रतीक चिन्ह (New Emblem/Logo) का विधिवत अनावरण किया। इसके साथ ही, विधानसभा भवन की भव्यता और प्रदेश की सांस्कृतिक व शौर्य विरासत को और अधिक प्रगाढ़ बनाने के लिए परिसर के 13 प्रमुख द्वारों का ऐतिहासिक नामकरण भी किया गया।

राजस्थान की जीवन रेखा और संस्कृति का अनूठा समावेश

विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की विशेष पहल पर तैयार किए गए इस नए लोगो (Emblem) में राजस्थान के जनमानस की सोच और उसकी सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत समावेश किया गया है। नए प्रतीक चिन्ह में मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण आकृतियों को उकेरा गया है:

  • विधान भवन की भव्य छवि: जो प्रदेश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक शक्ति का मुख्य केंद्र है।
  • राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ और राज्य पुष्प ‘रोहिड़ा’: राज्यपाल ने खेजड़ी को राजस्थान का कल्पवृक्ष बताते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए ऐतिहासिक खेजड़ली बलिदान (1730 ई.) की महान परंपरा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह विषम परिस्थितियों में भी गौरव के साथ खड़े रहने वाली मरुधरा की जीवटता का प्रतीक है।
  • गोडावण और ऊंट का समावेश: जो राजस्थान की समन्वयवादी तथा पर्यावरण-अनुकूल संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है।

इतिहास केवल 1952 से नहीं, महाराजा गंगासिंह ने 1913 में ही रख दी थी नींव

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने कहा कि विधानसभा केवल पत्थरों की इमारत नहीं बल्कि जन-आकांक्षाओं और लोकतंत्र का पवित्र सदन है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य साझा करते हुए बताया कि स्वतंत्र भारत में भले ही इस विधानसभा का विधिवत गठन मार्च 1952 में हुआ था, लेकिन राजस्थान की धरती पर जनप्रतिनिधित्व की वास्तविक शुरुआत वर्ष 1913 में ही हो चुकी थी। तब बीकानेर के दूरदर्शी शासक महाराजा गंगासिंह ने ‘प्रतिनिधि सभा’ की स्थापना कर जनभागीदारी की नींव रख दी थी।

थाली में भोजन छोड़ने के प्रसंग से दिया ‘प्रबंधन’ का मंत्र

भाषण के दौरान राज्यपाल ने भारत की पहली लोकसभा के अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर से जुड़ा एक बेहद प्रेरक और रोचक संस्मरण साझा किया। उन्होंने बताया:

“एक बार मावलंकर जी के पास एक व्यक्ति आया और खुद को अर्थशास्त्र व प्रबंधन (मैनेजमेंट) का बड़ा विशेषज्ञ बताते हुए काम की मांग करने लगा। श्री मावलंकर ने गौर किया कि उस व्यक्ति ने भोजन करते समय अपनी थाली में आवश्यकता से अधिक खाना लिया और बाद में बहुत सारा भोजन झूठा छोड़ दिया। मावलंकर जी ने उस व्यक्ति को टोकते हुए बेहद संजीदगी से कहा कि—जो व्यक्ति अपनी थाली के भोजन का प्रबंधन ठीक से नहीं कर सकता, वह समाज या व्यवस्था का प्रबंधन कैसे संभालेगा?“

राज्यपाल ने इस प्रसंग के माध्यम से सभी विधायकों और मंत्रियों को संदेश दिया कि जीवन में आदर्श आचरण और संसाधनों का सही प्रबंधन व्यवहार में आना अत्यंत आवश्यक है।

शिक्षा के सुदृढ़ीकरण और ‘कर्तव्य’ बोध पर विशेष जोर

महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष के रूप में अपने पुराने अनुभवों को याद करते हुए राज्यपाल ने कहा कि लोकतंत्र तभी दीर्घायु और मजबूत होता है, जब देश का प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों की मांग के साथ-साथ संविधान प्रदत्त कर्तव्यों के प्रति भी पूरी तरह सजग रहे। उन्होंने देश की उन्नति के लिए शिक्षा को मुख्य आधार बताया और जोर दिया कि ग्रामीण, पिछड़े और गरीब वर्गों के बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण व व्यावहारिक शिक्षा पहुंचे, इसके लिए सभी को मिलकर सोचना चाहिए।

सदन में गूंजे ठहाके और गणमान्य जनों की उपस्थिति

कार्यक्रम के दौरान उस समय माहौल काफी हल्का-फुल्का और रोचक हो गया जब राज्यपाल द्वारा राजस्थान के पहले मुख्यमंत्री को लेकर पूछे गए सवाल पर सदन में हीरालाल शास्त्री और टीकाराम पालीवाल के नाम आए। इस दौरान नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की तरफ इशारा होने पर पूरे सदन में ठहाके गूंज उठे। इस ऐतिहासिक समारोह के दौरान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, कैबिनेट के तमाम मंत्रीगण, संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल सहित सत्ता पक्ष और विपक्ष के कई वरिष्ठ विधायक व गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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