राजस्थान में आरजीएचएस योजना (RGHS) इस समय अपने सबसे गहरे संकट से गुजर रही है। राज्य के करीब 50 लाख कर्मचारी, पेंशनर्स और उनके आश्रित पिछले 20 दिनों से निजी अस्पतालों में इलाज के लिए दर-दर भटक रहे हैं। निजी अस्पतालों ने भारी बकाया और तकनीकी विसंगतियों का हवाला देते हुए कैशलेस सेवाओं पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
वेतन से ‘अनिवार्य’ कटौती, पर इलाज ‘स्वैच्छिक’?
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जहाँ एक ओर अस्पतालों ने दरवाजे बंद कर दिए हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार हर महीने कर्मचारियों और पेंशनर्स के वेतन से ₹265 से लेकर ₹875 तक की कटौती अनिवार्य रूप से कर रही है।
मासिक कटौती का गणित:
| बेसिक-पे (Basic Pay) | मासिक कटौती (रुपए में) |
| ₹18,000 तक | ₹265 |
| ₹18,001 से ₹33,500 तक | ₹440 |
| ₹33,501 से ₹54,000 तक | ₹658 |
| ₹54,000 से अधिक | ₹875 |
विवाद की जड़: क्यों बंद हुई ‘कैशलेस’ सेवा?
अस्पतालों और सरकार के बीच इस गतिरोध के पीछे चार मुख्य कारण सामने आए हैं:
- भारी बकाया भुगतान: निजी अस्पतालों का आरोप है कि सरकार पर उनका ₹2200 करोड़ का बकाया है। कुछ आंकड़ों के अनुसार, पिछले आठ महीनों से लगभग ₹22,000 करोड़ का भुगतान अटका हुआ है।
- घोटाला और गिरफ्तारी: हाल ही में डॉ. सोनदेव बंसल की गिरफ्तारी के बाद डॉक्टरों में भारी रोष है। एसोसिएशन का आरोप है कि तकनीकी गड़बड़ी के नाम पर डॉक्टरों को निशाना बनाया जा रहा है।
- नियमों में विसंगतियां: नई एसओपी (SOP) में निजी अस्पतालों के सुझावों को शामिल नहीं किया गया है। 30 बेड वाले अस्पतालों में कंसल्टेंट की अनिवार्य संख्या जैसे नियमों पर असहमति बनी हुई है।
- क्लेम रिजेक्शन: अस्पतालों द्वारा पेश किए गए मेडिकल दावों (Claims) के रिजेक्ट होने की उच्च दर ने निजी संस्थानों की आर्थिक कमर तोड़ दी है।
जिम्मेदारों के तर्क
“आरजीएचएस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। जो अस्पताल अनियमितता कर रहे हैं, उन्हें सजा मिले, लेकिन ईमानदारी से काम करने वाले अस्पतालों का तुरंत भुगतान किया जाए।”
— डॉ. विजय कपूर, अध्यक्ष, प्राइवेट हॉस्पिटल एंड नर्सिंग होम एसोसिएशन
“ज्यादातर अस्पतालों में इलाज चल रहा है। बजट की उपलब्धता के अनुसार भुगतान किया जा रहा है। अस्पतालों और फार्मेसी की समस्याओं का समाधान जल्द किया जाएगा।”
— हरजी लाल अटल, सीईओ, राशा (RASHA)