जयपुर/बयाना। प्रदेश भर में आज आस्था और आरोग्य का महापर्व ‘शीतला अष्टमी’ (बासौड़ा) हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। जयपुर के प्रसिद्ध चाकसू स्थित शील की डूंगरी से लेकर बयाना के प्राचीन मंदिरों तक, तड़के सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाओं ने माता शीतला की पारंपरिक पूजा-अर्चना कर परिवार की खुशहाली और संक्रामक रोगों से मुक्ति की मन्नत मांगी।
बासी भोजन का लगा भोग, नहीं जलाया गया चूल्हा
परंपरा के अनुसार, शीतला अष्टमी के दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। श्रद्धालुओं ने एक दिन पूर्व (सप्तमी) को तैयार किए गए विशेष पकवानों जैसे— मीठे चावल, राबड़ी, पुए, पकौड़ी और दही का माता को भोग लगाया। ‘ठंडा भोजन’ ग्रहण करने की यह परंपरा बदलते मौसम में स्वास्थ्य और शीतलता का प्रतीक मानी जाती है।
आरोग्य और स्वच्छता का पावन संदेश
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता शीतला को चेचक, खसरा और फुंसी जैसे संक्रामक रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है।
- स्वरूप का महत्व: माता के हाथों में मौजूद कलश, सूप, झाड़ू और नीम के पत्ते स्वच्छता का संदेश देते हैं।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: चैत्र मास से गर्मी की शुरुआत होती है। बासौड़ा पूजन यह संदेश देता है कि अब से खान-पान में शीतलता का ध्यान रखा जाए और शरीर के तापमान को संतुलित रखा जाए।
“शीतला अष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आयुर्वेद और स्वच्छता का संगम है। झाड़ू और नीम के पत्ते दर्शाते हैं कि घर और आसपास की सफाई ही रोगों से बचने का एकमात्र उपाय है।” — स्थानीय पुजारी
बयाना में कई दिनों से जारी था उत्सव
बयाना क्षेत्र में शीतला माता पूजन को लेकर पिछले कई दिनों से तैयारियां और अनुष्ठान चल रहे थे। आज अष्टमी के मुख्य अवसर पर मंदिरों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखी गईं। महिलाओं ने मंगल गीत गाकर माता की अगवानी की और बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना की।
पूजन विधि और परंपरा
भक्तों ने सूर्योदय से पहले स्नान कर शीतला माता के मंदिर पहुंचकर जल अर्पित किया। इसके बाद कुमकुम, अक्षत और बासी पकवानों से माता की पूजा की गई। पूजन के बाद घर के मुख्य द्वार पर ‘स्वास्तिक’ बनाकर सुख-समृद्धि की प्रार्थना की गई। अंत में, माता को अर्पित किया गया ‘बासौड़ा’ प्रसाद के रूप में पूरे परिवार में वितरित किया गया।
