जयपुर: राजस्थान सरकार ने पंचायती राज चुनावों में दशकों से चली आ रही ‘दो संतान’ की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। सोमवार को विधानसभा में पारित हुए नए संशोधन विधेयक के बाद अब दो से अधिक संतान वाले माता-पिता भी पंचायती राज संस्थाओं (सरपंच, वार्ड पंच, प्रधान, जिला प्रमुख आदि) के चुनाव लड़ सकेंगे। पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने विधेयक पर चर्चा के दौरान कहा कि बदलती परिस्थितियों में अब यह नियम अप्रासंगिक (Irrelevant) हो चुका है।
क्यों बदला गया नियम? (मंत्री का तर्क)
विधेयक पर जवाब देते हुए मदन दिलावर ने स्पष्ट किया कि 1994 में जब यह कानून लाया गया था, तब मुख्य उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित करना था।
- जागरूकता का असर: पिछले तीन दशकों में महिलाओं में शिक्षा के प्रसार और सामाजिक जागरूकता के कारण जनसंख्या वृद्धि दर में उल्लेखनीय कमी आई है।
- समानता का अवसर: दो से अधिक बच्चे होने के कारण कई योग्य और समाज सेवा के इच्छुक व्यक्ति चुनाव लड़ने से वंचित रह जाते थे, जिन्हें अब अपनी योग्यता साबित करने का मौका मिलेगा।
पुराना नियम बनाम नया संशोधन (Table)
| विशेषता | राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 | संशोधित विधेयक, 2026 |
| पात्रता (Eligibility) | 2 से अधिक संतान होने पर अयोग्य | संतानों की संख्या की कोई सीमा नहीं |
| मुख्य उद्देश्य | जनसंख्या नियंत्रण | योग्य व्यक्तियों को समान अवसर देना |
| सम्बन्धित धारा | धारा 19 | धारा 19 में संशोधन |
| प्रभाव | हजारों उम्मीदवार चुनाव से बाहर थे | सभी योग्य नागरिक चुनाव लड़ सकेंगे |
अन्य राज्यों और सरकारी कर्मचारियों का हवाला ।
मंत्री दिलावर ने बताया कि राजस्थान अकेला ऐसा राज्य नहीं है जो यह कदम उठा रहा है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और हरियाणा जैसे राज्य इस प्रकार के प्रावधान को पहले ही समाप्त कर चुके हैं। इसके अलावा, उन्होंने पूर्ववर्ती सरकार द्वारा राजकीय कर्मचारियों के लिए ‘दो से अधिक संतान होने पर पदोन्नति (Promotion) न मिलने’ के नियम को खत्म किए जाने का भी उदाहरण दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समाज अब इन नियमों से आगे बढ़ चुका है।
विरोध और समर्थन के बीच पारित ।
विधानसभा में चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष ने इसे ‘लोकतंत्र की जीत’ बताया, जबकि विपक्ष के कुछ सदस्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता जताई। हालांकि, ध्वनिमत के साथ इस विधेयक को पारित कर दिया गया। अब इसे राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा, जिसके बाद यह पूरे प्रदेश में कानूनन लागू हो जाएगा।
