आपातकाल, बंटवारा और युद्ध: RSS नेता रामलाल ने गिनाए संघ के बड़े योगदान, कहा- ‘इमरजेंसी में जेल जाने वाले 80% लोग स्वयंसेवक थे’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख और वरिष्ठ नेता रामलाल ने देश के इतिहास के कुछ सबसे अहम मोड़ों—विभाजन, युद्ध और आपातकाल—में संघ की भूमिका को लेकर कई बड़े और चौंकाने वाले दावे किए हैं। महाराष्ट्र में संघ के कोंकण प्रभाग की एक बैठक के समापन समारोह को संबोधित करते हुए रामलाल ने कहा कि तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल (Emergency) के दौरान जेलों में बंद लोगों में लगभग 80 प्रतिशत आरएसएस (RSS) के कार्यकर्ता थे।

उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों के त्याग, देशभक्ति और सामाजिक योगदान को रेखांकित करते हुए मुख्य रूप से चार बड़े ऐतिहासिक संदर्भों का जिक्र किया:

1. आपातकाल (1975-1977) और लोकतंत्र की बहाली

रामलाल ने 21 महीने तक चले आपातकाल को याद करते हुए कहा, “अगर आपातकाल के दौरान आरएसएस स्वयंसेवकों ने इतने बड़े पैमाने पर सत्याग्रह में भाग नहीं लिया होता और जेलें नहीं भरी होतीं, तो तत्कालीन सरकार ने 1977 में आम चुनाव की घोषणा कभी नहीं की होती।” उन्होंने दावा किया कि आपातकाल में गिरफ्तार कुल लोगों में 80% संघ कार्यकर्ता थे। उन्होंने अपनी बात रखते हुए बताया कि आपातकाल के दौरान उन्होंने खुद भी आठ महीने जेल में काटे थे। संघ के कड़े विरोध के कारण ही देश लंबे समय तक सत्तावादी शासन का गवाह बनने से बच गया।

2. देश का बंटवारा (1947)

विभाजन की त्रासदी का जिक्र करते हुए रामलाल ने दावा किया कि पाकिस्तान या बांग्लादेश से जान बचाकर भारत आए कई लोग आज भी अपने जीवित रहने का श्रेय आरएसएस को देते हैं। उन्होंने कहा, “आप उस दौर में विस्थापित होकर आए किसी भी व्यक्ति से बात करें, वे यही कहेंगे कि वे केवल इसलिए जीवित हैं क्योंकि आरएसएस स्वयंसेवकों ने उनकी मदद की थी। इस दौरान कई स्वयंसेवकों ने अपनी जान का बलिदान भी दिया था।”

3. 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और यातायात प्रबंधन

संकट के समय नागरिक प्रशासन की मदद करने का उदाहरण देते हुए रामलाल ने 1965 के युद्ध का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान जब पुलिस बल की कमी थी, तब दिल्ली में आरएसएस के स्वयंसेवकों ने मात्र 24 घंटे का प्रशिक्षण लेकर यातायात प्रबंधन (Traffic Management) की जिम्मेदारी संभाली थी। यह प्रबंधन इतना बेहतरीन था कि उस दौरान दिल्ली में दुर्घटनाओं की संख्या सबसे कम दर्ज की गई थी।

4. 1962 का युद्ध और गणतंत्र दिवस परेड

उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद के हालातों का भी जिक्र किया। रामलाल ने बताया कि देश का मनोबल बढ़ाने के लिए तत्कालीन सरकार के आह्वान पर 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में मात्र कुछ ही दिनों की अल्प सूचना पर करीब 3,000 आरएसएस स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में तैयारी कर हिस्सा लिया था।

‘शाखाओं’ से आता है अनुशासन और समन्वय

अपने संबोधन के अंत में रामलाल ने आरएसएस की कार्यप्रणाली पर जोर देते हुए कहा कि संघ की दैनिक ‘शाखाओं’ के माध्यम से ही स्वयंसेवकों में अनुशासन, समन्वय और सामूहिक रूप से काम करने की भावना पैदा होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ की इन नियमित गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य विभिन्न धर्मों और वर्गों के लोगों के बीच एकता और देशभक्ति की भावना को मजबूत करना है।

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