मथुरा/गोवर्धन: सनातन धर्म में ब्रज भूमि और गिरिराज गोवर्धन का स्थान अत्यंत पूजनीय माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के साक्षात गवाह रहे गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने के लिए देश-विदेश से हर साल लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा साक्षात भगवान कृष्ण की परिक्रमा के समान पुण्यदायी मानी गई है।
कितने कोस की है परिक्रमा? (Total Distance of Parikrama)
पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोवर्धन परिक्रमा कुल 7 कोस की होती है। यदि इसे आज के आधुनिक मापदंडों (किलोमीटर) में मापा जाए, तो 1 कोस में लगभग 3 किलोमीटर होते हैं। इस लिहाज से गोवर्धन पर्वत की कुल परिक्रमा दूरी लगभग 21 किलोमीटर बैठती है। श्रद्धालु इस दूरी को अपनी श्रद्धा और शारीरिक क्षमता के अनुसार तय करते हैं।
दो भागों में बंटा है पूरा मार्ग: बड़ी और छोटी परिक्रमा (Big and Small Parikrama Route)
इस 21 किलोमीटर लंबी परिक्रमा को सुगम और सुव्यवस्थित बनाने के लिए दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है, जिन्हें ‘बड़ी परिक्रमा’ और ‘छोटी परिक्रमा’ कहा जाता है:
- बड़ी परिक्रमा (4 कोस – लगभग 12 किलोमीटर): इसकी शुरुआत मुख्य रूप से प्रसिद्ध ‘दानघाटी मंदिर’ से होती है। यहां से शुरू होकर परिक्रमा मार्ग आन्यौर गांव और पूंछरी का लौठा होते हुए जतीपुरा (मुखारविंद मंदिर) तक जाता है। जतीपुरा पहुंचकर बड़ी परिक्रमा का हिस्सा पूरा होता है।
- छोटी परिक्रमा (3 कोस – लगभग 9 किलोमीटर): जतीपुरा मुखारविंद से आगे का मार्ग छोटी परिक्रमा कहलाता है। इस मार्ग में श्रद्धालु प्रसिद्ध राधा कुंड, श्याम कुंड, कुसुम सरोवर और मानसी गंगा के दर्शन करते हुए वापस अपने शुरुआती बिंदु यानी दानघाटी मंदिर पहुंचते हैं। यहां आकर पूरी 7 कोस की परिक्रमा संपन्न होती है।
परिक्रमा मार्ग के प्रमुख और पवित्र पड़ाव (Famous Holy Places in Route)
21 किलोमीटर के इस सफर में आस्था और इतिहास से जुड़े कई प्रमुख स्थल आते हैं, जहां श्रद्धालु रुककर पूजा-अर्चना करते हैं:
- दानघाटी मंदिर: यह परिक्रमा का मुख्य केंद्र और शुरुआती बिंदु है, जहां गिरिराज जी के विशाल स्वरूप की पूजा होती है।
- पूंछरी का लौठा: राजस्थान की सीमा में आने वाले इस स्थान पर श्रीकृष्ण के परम सखा ‘लौठा जी’ का मंदिर है। माना जाता है कि यहां हाजिरी लगाए बिना परिक्रमा अधूरी रहती है।
- जतीपुरा (मुखारविंद): यहाँ गिरिराज पर्वत की शिला पर भगवान के मुख के दर्शन होते हैं, जहां श्रद्धालु दूध और भोग अर्पित करते हैं।
- राधा कुंड और श्याम कुंड: ये दोनों पवित्र कुंड राधारानी और श्रीकृष्ण के अलौकिक प्रेम के प्रतीक हैं, जहां स्नान का विशेष महत्व है।
- कुसुम सरोवर और मानसी गंगा: कुसुम सरोवर अपनी सुंदर ऐतिहासिक छतरियों के लिए प्रसिद्ध है, वहीं मानसी गंगा गोवर्धन के केंद्र में स्थित एक पवित्र झील है, जिसका जल गंगा जी के समान माना गया है।
दंडवत से लेकर ई-रिक्शा तक: कैसे पूरी होती है यात्रा?
गोवर्धन की परिक्रमा करने के कई तरीके हैं। अधिकांश श्रद्धालु नंगे पैर पैदल ही इस मार्ग को 5 से 7 घंटे में पूरा करते हैं। वहीं, कुछ श्रद्धालु कड़े संकल्प के साथ जमीन पर साष्टांग प्रणाम करते हुए ‘दंडवत परिक्रमा’ करते हैं, जिसे पूरा करने में कई दिन या हफ्ते लग जाते हैं। इसके अलावा, बुजुर्गों, बच्चों और बीमार लोगों की सुविधा के लिए अब पूरे मार्ग में ई-रिक्शा की व्यवस्था भी उपलब्ध रहती है।
क्या है इसका पौराणिक महत्व? (Mythological Importance)
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, द्वापर युग में देवराज इंद्र के अहंकार को नष्ट करने और ब्रजवासियों को मूसलाधार बारिश से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा (छोटी उंगली) पर 7 दिनों तक उठाए रखा था। इसके बाद स्वयं कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के बजाय प्रकृति और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की सीख दी। तभी से गोवर्धन पूजा और परिक्रमा की यह पावन परंपरा निरंतर चली आ रही है।