प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को किसानों के लिए अधिक पारदर्शी, तकनीक आधारित और प्रभावी बनाने की दिशा में राजस्थान सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने योजना में सुधार के लिए केंद्र सरकार को 11 महत्वपूर्ण प्रस्ताव भेजे हैं। इन प्रस्तावों का उद्देश्य किसानों को बीमा का वास्तविक लाभ दिलाना, फसल नुकसान के आकलन में होने वाली गड़बड़ियों को रोकना और क्लेम भुगतान की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है।
राज्य के कृषि विभाग ने किसान संगठनों, किसान प्रतिनिधियों और विभागीय अधिकारियों से मिले सुझावों के आधार पर ये प्रस्ताव कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के फसल बीमा सीईओ को भेजे हैं। सरकार का जोर खास तौर पर तकनीक के इस्तेमाल और किसानों की सहमति के बिना बीमा प्रीमियम कटौती जैसी समस्याओं को दूर करने पर है।
बिना सहमति प्रीमियम कटौती पर रोक की मांग
राजस्थान सरकार ने प्रस्ताव दिया है कि ऋणी किसानों के लिए भी फसल बीमा पूरी तरह स्वैच्छिक होना चाहिए। किसान की स्पष्ट सहमति के बिना उसके बैंक खाते से फसल बीमा का प्रीमियम नहीं काटा जाए।
इससे उन किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके खातों से ऋण के कारण स्वतः बीमा प्रीमियम काट लिया जाता है, जबकि वे अपनी फसल का बीमा नहीं कराना चाहते।
हर किसान को एग्रीस्टैक आईडी से जोड़ने का प्रस्ताव
राज्य सरकार ने सभी किसानों की फसल बीमा पॉलिसी को एग्रीस्टैक आईडी से जोड़ने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही आधार, एग्रीस्टैक आईडी और जनआधार से संबंधित बैंक विवरण को एनसीआईपी पोर्टल पर स्वतः उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा गया है।
इस व्यवस्था से किसान की पहचान, बैंक खाते और बीमा पॉलिसी के बीच बेहतर डिजिटल लिंक तैयार किया जा सकेगा और दस्तावेजों से जुड़ी परेशानियां कम हो सकती हैं।

ई-गिरदावरी से फसल का होगा सत्यापन
राजस्थान सरकार ने सुझाव दिया है कि ई-गिरदावरी या क्रॉप बुकिंग ऐप के जरिए किसान के खेत में बोई गई फसल का सत्यापन किया जाए। इसके बाद ही संबंधित बीमा पॉलिसी को मंजूरी दी जाए।
इसका उद्देश्य कागजी रिकॉर्ड और वास्तविक खेत में बोई गई फसल के बीच अंतर को कम करना है। तकनीक के जरिए फसल की जानकारी दर्ज होने से बीमा प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय हो सकती है।
खेत को इकाई मानकर नुकसान का आकलन
प्रस्तावों में सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक खेत स्तर पर फसल नुकसान का आकलन है।
राज्य सरकार ने सुझाव दिया है कि फसल कटाई प्रयोगों में होने वाली संभावित अनियमितताओं को रोकने के लिए प्रत्येक किसान के खेत को एक इकाई माना जाए। तकनीक आधारित प्रणाली से नुकसान का आकलन करके उसी के आधार पर किसान का क्लेम तय किया जाए।
सरकार का मानना है कि इससे नुकसान के आकलन में मनमानी की गुंजाइश कम होगी और वास्तविक नुकसान झेलने वाले किसानों को उचित मुआवजा मिल सकेगा।
क्लेम में देरी हुई तो बीमा कंपनियों पर ब्याज
राजस्थान ने केंद्र से यह भी मांग की है कि यदि बीमा कंपनी किसान के वैध क्लेम का भुगतान निर्धारित समय पर नहीं करती है तो उस पर ब्याज या पेनल्टी स्वतः लागू हो।
यह प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फसल खराब होने के बाद किसान को समय पर आर्थिक सहायता की जरूरत होती है। क्लेम भुगतान में लंबी देरी होने पर किसान की आर्थिक परेशानी और बढ़ जाती है।
पॉलिसी निरस्त होने पर ब्याज सहित प्रीमियम वापसी
सरकार ने यह भी सुझाव दिया है कि यदि किसी कारण से किसान की बीमा पॉलिसी निरस्त होती है तो उसे जमा किया गया प्रीमियम ब्याज सहित वापस किया जाए।
इससे किसानों के हितों की बेहतर सुरक्षा होने की उम्मीद है और बीमा प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ सकती है।
एड-ऑन कवर के लिए तकनीकी मानक तय हों
राज्य सरकार ने एड-ऑन कवर से जुड़े क्लेम के लिए भी तकनीक आधारित स्पष्ट मानक निर्धारित करने का प्रस्ताव दिया है। इससे अतिरिक्त बीमा कवर के तहत नुकसान की स्थिति में क्लेम तय करने की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और एकरूप हो सकती है।
शिकायत निवारण समिति में किसान प्रतिनिधि भी हों
राजस्थान ने राज्य स्तरीय शिकायत निवारण समिति में किसान प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रस्ताव भी रखा है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बीमा से संबंधित शिकायतों और विवादों की सुनवाई में किसानों का पक्ष सीधे सामने आ सके।
राजस्थान का 64 प्रतिशत कृषि क्षेत्र अभी भी बीमा से बाहर
फसल बीमा योजना की मौजूदा स्थिति भी चिंता का विषय है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2025-26 में राजस्थान के कुल कृषि क्षेत्र का केवल 36 प्रतिशत हिस्सा ही फसल बीमा के दायरे में आया, जबकि करीब 64 प्रतिशत कृषि क्षेत्र अब भी बीमा से बाहर रहा।
जिलों के बीच भी बीमा कवरेज में बड़ा अंतर देखने को मिला। चूरू में कवरेज करीब 77 प्रतिशत रही, जबकि धौलपुर में यह केवल 5 प्रतिशत, करौली में 7 प्रतिशत और दौसा में 9 प्रतिशत दर्ज की गई।
पांच साल में किसानों को मिले 18,189 करोड़ के क्लेम
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में राजस्थान के किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत कुल 18,189.16 करोड़ रुपए के बीमा दावे का भुगतान किया गया।
इनमें चूरू जिले के किसानों को सबसे अधिक करीब 2,459.63 करोड़ रुपए, हनुमानगढ़ को 2,253.59 करोड़ रुपए, जोधपुर को 1,570.94 करोड़ रुपए, जालोर को 1,392.02 करोड़ रुपए, नागौर को 1,287.89 करोड़ रुपए और बीकानेर को 1,101.64 करोड़ रुपए के क्लेम मिले।
दूसरी ओर राजसमंद में करीब 4.66 करोड़ रुपए, धौलपुर में 7.23 करोड़ रुपए और करौली में 9.51 करोड़ रुपए के क्लेम का भुगतान हुआ।
पांच साल में 26,757 करोड़ रुपए प्रीमियम जमा
आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत कुल 26,757.56 करोड़ रुपए का प्रीमियम जमा हुआ। इसमें किसानों का हिस्सा 4,650.78 करोड़ रुपए, राजस्थान सरकार का हिस्सा 11,253.68 करोड़ रुपए और केंद्र सरकार का हिस्सा 10,853.10 करोड़ रुपए रहा।
इसी अवधि में किसानों को 18,189.16 करोड़ रुपए के क्लेम का भुगतान किया गया। रिपोर्ट के अनुसार प्रीमियम और क्लेम के इन आंकड़ों के आधार पर बीमा कंपनियों के हिस्से में 8,568.40 करोड़ रुपए का अंतर रहा।
सरकार का फोकस किसान हित और पारदर्शिता पर
राजस्थान सरकार की ओर से भेजे गए प्रस्तावों का मुख्य उद्देश्य फसल बीमा योजना में किसानों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ क्लेम प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाना है। तकनीक के इस्तेमाल से फसल की वास्तविक स्थिति, नुकसान का आकलन और बीमा क्लेम को आपस में जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
अगर केंद्र सरकार इन प्रस्तावों को मंजूरी देती है तो राजस्थान समेत देशभर के किसानों के लिए फसल बीमा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खासकर बिना सहमति प्रीमियम कटौती, खेत स्तर पर नुकसान आकलन और क्लेम में देरी पर बीमा कंपनियों पर ब्याज जैसे प्रस्ताव सीधे किसानों के हितों से जुड़े हैं।