पीएचईडी के ₹20,000 करोड़ के ‘वसूली सिंडिकेट’ का असली खिलाड़ी संजय अग्रवाल; पार्टनर जेल में, मास्टरमाइंड बाहर?

राजस्थान के जलदाय विभाग (PHED) में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुए ‘सदी के सबसे बड़े’ भ्रष्टाचार के खेल में रोज़ाना नए और चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। हजारों करोड़ के इन काले कारनामों ने प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही की नींव हिला दी है। इस पूरे भ्रष्टाचार के केंद्र में एक नाम प्रमुखता से गूंज रहा है, जो वर्तमान में जांच एजेंसियों की फाइलों में ‘लापता’ बना हुआ है— अधीक्षण अभियंता (SE) संजय अग्रवाल

भ्रष्टाचार का ‘ब्लूप्रिंट’ और अग्रवाल की रणनीति

सूत्रों और विभाग के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार, वर्ष 2022 और 2023 में पीएचईडी में हुए भ्रष्टाचार की पटकथा कथित तौर पर संजय अग्रवाल ने ही तैयार की थी। उन्हें तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मंत्री महेश जोशी का ‘दाहिना हाथ’ और उनके करीबी संजय बड़ाया की ‘वसूली गैंग’ का मुख्य रणनीतिकार माना जाता है।

संजय अग्रवाल पर लगे गंभीर आरोप:

  • JJM टेंडरों की पूलिंग: जल जीवन मिशन (JJM) के तहत करीब 20,000 करोड़ रुपये के टेंडरों की पूलिंग करने का मास्टर प्लान अग्रवाल ने ही बनाया था।
  • वसूली सिंडिकेट: पूर्व मंत्री और उनके करीबियों के साथ मिलकर तबादलों की ‘रेट लिस्ट’ जारी करना और एक व्यवस्थित वसूली तंत्र चलाना।
  • इंजीनियर्स की ब्लैकमेलिंग: जेईएन (JEN) से लेकर मुख्य अभियंता (CE) स्तर तक के अधिकारियों से जांच और तबादलों के डर के नाम पर मोटी रकम वसूलना।
  • इरकॉन (IRCON) फर्जी सर्टिफिकेट कांड: करोड़ों के टेंडर हथियाने के लिए इरकॉन के फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों को सिस्टम में सेट करने और उन्हें मैनेज करने की मास्टर प्लानिंग करना।
  • कमिशन फिक्सिंग: प्रत्येक छोटे-बड़े टेंडर में कमीशन का प्रतिशत पहले से तय करना और उसे ठेकेदारों से वसूलना।

पार्टनर जेल में, मास्टरमाइंड पर कार्रवाई कब?

जलदाय विभाग के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब संजय अग्रवाल के कथित ‘पार्टनर’ और उन्हें संरक्षण देने वाले मुख्य अभियंता दिनेश गोयल को एसीबी (ACB) गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है, तो अग्रवाल अब तक शिकंजे से बाहर क्यों हैं?

सत्ता परिवर्तन और ‘जीरो टॉलरेंस’ पर सवाल

प्रदेश में भाजपा सरकार के आने के बाद भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई जा रही है। इसके बावजूद संजय अग्रवाल जैसे दागी अधिकारी का सलाखों के पीछे न होना सरकार और जांच एजेंसियों की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है। ‘एक्सपोज़ नाउ’ इस प्रकरण में तीन तीखे सवाल पूछता है:

  1. क्या संजय अग्रवाल के पास विभाग के रसूखदारों के ऐसे राज दबे हैं, जिसके कारण एजेंसियां उन पर हाथ डालने से कतरा रही हैं?
  2. क्या पुराने भ्रष्टाचार के सिंडिकेट ने नई सरकार के सिस्टम में भी अपनी पैठ बना ली है?
  3. प्रवर्तन निदेशालय (ED), जो जल जीवन मिशन घोटाले में लगातार छापेमारी कर रही है, उसकी रडार से यह मास्टरमाइंड अब तक कैसे बचा हुआ है?

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