जयपुर। राजस्थान में पंचायत और स्थानीय निकाय (नगर पालिका/नगर निगम) के चुनाव तय समय पर होंगे या दिसंबर तक के लिए टल जाएंगे, इस पर आज तस्वीर पूरी तरह साफ होने जा रही है। राज्य सरकार और चुनाव आयोग द्वारा चुनाव टालने के लिए दायर किए गए प्रार्थना पत्र पर राजस्थान हाईकोर्ट आज (22 मई) अपना बहुप्रतीक्षित और बड़ा फैसला सुना सकता है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting CJ) जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने इस महत्वपूर्ण मामले में बीते 11 मई को दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित (Reserve) रख लिया था, जिस पर आज पर्दा उठेगा।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को एक साथ 439 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को सख्त आदेश दिए थे कि वह 15 अप्रैल 2026 तक हर हाल में प्रदेश में पंचायत और निकाय चुनाव संपन्न करा ले।
हालांकि, डेडलाइन खत्म होने से पहले भजनलाल सरकार ने हाईकोर्ट में एक प्रार्थना पत्र दाखिल कर दिया। सरकार ने इस समय-सीमा में चुनाव कराने को ‘व्यावहारिक रूप से असंभव’ बताया और चुनाव कराने के लिए दिसंबर 2026 तक का समय मांग लिया।
सरकार ने कोर्ट में क्यों मांगा समय? (प्रमुख दलीलें)
सरकार और महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने चुनाव टालने के पीछे कोर्ट के सामने प्रशासनिक और व्यावहारिक दलीलों की एक पूरी सूची रखी, जिसे नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है:
| कारण / तर्क | सरकार की दलील का विवरण |
|---|---|
| मौसम की मार (गर्मी-बरसात) | मई-जून में राजस्थान में भयंकर लू (Heatwave) चलती है। इसके बाद जुलाई से सितंबर तक भारी बारिश होती है, जिसमें ग्रामीण मतदाता कृषि कार्यों में अत्यधिक व्यस्त रहते हैं। |
| कर्मचारियों का भारी संकट | शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों को मिलाकर कुल 68 हजार से ज्यादा मतदान केंद्र बनाए जाएंगे, जिनके संचालन के लिए 3.4 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों की आवश्यकता होगी, जो फिलहाल जुटाना संभव नहीं है। |
| आरक्षण और सीमांकन का पेंच | वार्डों के आंतरिक सीमांकन पर दो अलग-अलग न्यायिक फैसलों और ‘ओबीसी आयोग’ की रिपोर्ट अब तक न आने के कारण सीटों का आरक्षण तय करने में देरी हुई है। |
11 मई की सुनवाई: कोर्ट ने लगाई थी कड़ी फटकार
पिछली सुनवाई (11 मई) के दौरान कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने सरकार की इन दलीलों पर सख्त नाराजगी जाहिर की थी। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था- “सरकार का रवैया ठीक नहीं है। चुनाव की तैयारियों के लिए आपको पहले ही पर्याप्त समय दिया जा चुका था।” जब सरकार ने मौसम और ओबीसी आयोग का हवाला दिया, तो बेंच ने साफ सवाल किया कि आदेश निकायों को लेकर था, तो फिर पंचायत चुनाव क्यों नहीं कराए गए? कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ओबीसी आयोग क्या कर रहा है, यह अदालत के सामने विचारणीय विषय नहीं है। अदालत ने सरकार के ‘गर्मी-बरसात’ वाले तर्कों से असहमति जताते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
विपक्ष हमलावर: दायर हुई अवमानना याचिका
सरकार द्वारा चुनाव टालने की कोशिशों पर विपक्ष भी पूरी तरह से हमलावर है। पूर्व कांग्रेस विधायक संयम लोढ़ा और गिर्राज सिंह देवंदा ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे ‘कोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना’ करार दिया है।
इस संबंध में उन्होंने हाईकोर्ट में एक अवमानना याचिका (Contempt Petition) भी दायर की है, जिस पर जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की बेंच में आगामी 26 मई को सुनवाई होनी है।
संयम लोढ़ा का बयान: “राजस्थान की जनता को उनके वोट देने के संवैधानिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है। चुनाव न होने से पंचायतों और निकायों में भारी अव्यवस्था फैल गई है। स्थानीय स्तर पर विकास के सारे काम पूरी तरह ठप हैं। लोग परेशान हैं और पूरा सिस्टम बेहाल है।”
आज के फैसले पर टिकीं प्रदेश की नजरें
अब सबकी निगाहें आज आने वाले फैसले पर टिक गई हैं। यदि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की बेंच आज सरकार के प्रार्थना पत्र को खारिज कर देती है, तो सरकार और राज्य चुनाव आयोग को बिना किसी देरी के तुरंत चुनाव कराने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। वहीं, यदि कोर्ट से सरकार को राहत मिल जाती है, तो प्रदेश में नई स्थानीय सरकार के गठन के लिए जनता को इस साल के अंत (दिसंबर 2026) तक का लंबा इंतजार करना पड़ेगा।