वन विभाग में ‘गृहयुद्ध’: राजगढ़ के 17 करोड़ के पौधारोपण घोटाले में मुख्यालय ही बन रहा भ्रष्टाचारियों की ढाल

जयपुर: राजस्थान के वन विभाग में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई को लेकर एक गंभीर प्रशासनिक संघर्ष छिड़ गया है। जहाँ एक ओर जांच अधिकारी करोड़ों का गबन करने वाले फील्ड अफसरों पर शिकंजा कसना चाहते हैं, वहीं विभाग का शीर्ष नेतृत्व उन्हें ‘अभयदान’ देने के आरोपों से घिरा है। इस खींचतान का मुख्य केंद्र अलवर का 17 करोड़ रुपए का बहुचर्चित राजगढ़ पौधारोपण घोटाला है।

हालात ऐसे हैं कि कथित घोटाले के आरोपी अफसर अभी भी अपने पदों पर जमे हैं, जबकि दोषियों को सजा दिलाने की वकालत करने वाले मुख्य वन संरक्षक (CCF) राजीव चतुर्वेदी को अचानक जांच से बेदखल कर दिया गया है। चौंकाने वाला पहलू यह है कि यह पूरा मामला वन मंत्री संजय शर्मा की व्यक्तिगत जानकारी में होने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर भारी लीपापोती के संकेत मिल रहे हैं।

सीसीएफ के आरोप: ‘लेटर बम’ से खुला राज

विभाग में ‘खेल’ का खुलासा सीसीएफ राजीव चतुर्वेदी के 12 मार्च 2026 के एक ‘लेटर बम’ से हुआ, जिसमें उन्होंने विभाग के मुखिया, कार्यवाहक प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) पवन कुमार उपाध्याय पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं:

  • FIR में जानबूझकर देरी: 17 करोड़ के गबन की पुष्टि के बावजूद मुख्यालय ने 6 महीने तक केस का प्रस्ताव दबाए रखा।
  • नियम विरुद्ध नई जांच: मामले को भटकाने के लिए जांच मूल अधिकारी से छीनकर नियमों के खिलाफ एक जूनियर अधिकारी को सौंप दी गई।
  • दोषियों को संरक्षण: दो आईएफएस (IFS) अधिकारियों को नोटिस के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। साथ ही, अरण्य भवन मुख्यालय में हुए 20 एयरकंडीशनर घोटाले पर भी विभाग मौन है।
  • ACB जांच से इनकार: प्रारंभिक जांच में घोटाला साबित होने और एसीबी (ACB) जांच की सिफारिश के बावजूद मुख्यालय ने चुप्पी साध ली और बिना कारण दोबारा जांच बिठा दी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी

इस मामले में मुख्यालय की कार्यप्रणाली सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का उल्लंघन करती नजर आ रही है:

  1. ललिता कुमारी केस (2014): संज्ञेय अपराध पर तत्काल FIR अनिवार्य है, लेकिन यहाँ गबन की पुष्टि के बाद भी फाइल को छह महीने तक दबाकर रखा गया, जो सीधे तौर पर कोर्ट की अवमानना है।
  2. विनीत नारायण (1997) एवं सुब्रमण्यम केस (2013): जांच अधिकारियों का मनमाना तबादला प्रतिबंधित है, फिर भी चतुर्वेदी को रातों-रात हटाना उन्हें मिलने वाले कानूनी संरक्षण के विरुद्ध है।

जिम्मेदारों का पक्ष: जवाब देने से कतराए अधिकारी

  • पवन कुमार उपाध्याय (पीसीसीएफ): “मैं इस मामले में बयान नहीं दूंगा। इस पर जवाब एसीएस और मंत्री जी ही देंगे।”
  • अपूर्ण कृष्ण श्रीवास्तव (तत्कालीन DFO अलवर): “मामले की जांच में सिर्फ मेरा नाम लेना सही नहीं है। उस दौरान कुल आठ डीएफओ कार्यरत रहे थे।”
  • राजेंद्र कुमार हुड्डा (आरोपी अधिकारी – वर्तमान DFO अलवर): “मामले में जांच चल रही है। मैं इस पर कुछ नहीं बोलूंगा।” (यह कहते हुए उन्होंने फोन काट दिया)।

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