पहाड़ों की कटाई और खनन पर शीर्ष अदालत सख्त: मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने दिए स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा के आदेश

Madhu Manjhi

जयपुर। राजस्थान सहित पूरे उत्तर भारत के लिए लाइफलाइन मानी जाने वाली अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व को बचाने, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोकने और अनियंत्रित खनन पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और बेहद कड़ा कदम उठाया है. माननीय मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने अरावली पर्वतमाला की वैज्ञानिक परिभाषा तय करने और इससे जुड़े बेहद संवेदनशील व अहम विधिक मुद्दों की गहन जांच के लिए एक 5 सदस्यीय हाई-पावर कमेटी (उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति) का गठन करने का आधिकारिक आदेश पारित किया है. यह नवनियुक्त कमेटी आगामी 31 अगस्त 2026 से पहले अपनी विस्तृत और स्वतंत्र वैज्ञानिक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी, जिसके बाद 7 सितंबर 2026 को इस मामले की अगली निर्णायक सुनवाई की जाएगी.

क्यों पड़ी इस नई हाई-पावर्ड कमेटी की जरूरत?

शीर्ष अदालत ने अपने लिखित आदेश में स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया कि अरावली जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और उसकी समृद्ध जैव विविधता को लेकर कोई भी दूरगामी फैसला बिना देश के शीर्ष डोमेन विशेषज्ञों की राय के नहीं लिया जा सकता है. अदालत ने पूर्व में (29 दिसंबर 2025 और 26 फरवरी 2026 को) दिए गए अपने ही आदेशों का कड़ाई से हवाला देते हुए कहा कि 3 अक्टूबर 2025 को पूर्ववर्ती प्रारंभिक समिति द्वारा सौंपी गई पुरानी रिपोर्ट की एक स्वतंत्र, पारदर्शी और निष्पक्ष वैज्ञानिक समीक्षा किया जाना वर्तमान समय में बेहद जरूरी है. न्यायालय का मानना है कि वैज्ञानिक आधार के बिना ऐसा कोई प्रशासनिक कदम न उठ जाए, जिसके पर्यावरणीय नुकसान को बाद में सुधारना मानव जाति के लिए पूरी तरह असंभव हो जाए.

कमेटी के गठन के 5 मुख्य बिंदु और जांच के उद्देश्य:

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस भाई-पावर कमेटी के लिए पांच सबसे महत्वपूर्ण जांच बिंदु (Terms of Reference) तय किए हैं:

  1. संरक्षित क्षेत्र की जांच: क्या ‘500 मीटर की दूरी’ के नियम को लागू करने की वजह से अरावली का वास्तविक संरक्षित वन क्षेत्र लगातार कम हो रहा है या नहीं?
  2. अनियंत्रित खनन का सच: क्या इस सीमित दूरी के सीमांकन का अनुचित लाभ उठाकर तथाकथित ‘गैर-अरावली क्षेत्रों’ के नाम पर खनन माफियाओं द्वारा अनियंत्रित और अवैध खनन को बढ़ावा दिया जा रहा है?
  3. पारिस्थितिकी निरंतरता का परीक्षण: यदि 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियां तय सीमा से 500 मीटर से भी अधिक की दूरी पर स्थित हैं, तो क्या वे भी वैज्ञानिक रूप से एक निरंतर पारिस्थितिकी संरचना (Continuous Ecological Structure) का ही हिस्सा हैं?
  4. पहाड़ियों के दावों का वैज्ञानिक एक्स-रे: राजस्थान सरकार के इस प्रशासनिक दावे की वैज्ञानिक और तथ्यात्मक जांच करना कि राज्य में मौजूद कुल 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियां ही 100 मीटर की ऊंचाई के तय मानदंड को पूरा करती हैं.
  5. पर्यावरण सुरक्षा: यह पूरी तरह सुनिश्चित करना कि किसी भी नई परिभाषा या प्रशासनिक सीमांकन के कारण अरावली के मूल पर्यावरण और वन्यजीव पारिस्थितिकी तंत्र को तनिक भी नुकसान न पहुंचे.

देश के ये शीर्ष विशेषज्ञ संभालेंगे कमेटी की कमान:

सुप्रीम कोर्ट ने इस कमेटी में देश के सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरणविदों और भू-वैज्ञानिकों को शामिल किया है:

  • पदेन अध्यक्ष: महानिदेशक, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE).
  • सदस्य: डॉ. सुभाष आशुतोष (पूर्व महानिदेशक, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया).
  • सदस्य: डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा (सेवानिवृत्त निदेशक, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया).
  • सदस्य: श्री बृज मोहन सिंह राठौर (पूर्व संयुक्त सचिव, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय).
  • सदस्य: प्रो. अशोक के. भटनागर (पूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष वनस्पति विज्ञान, दिल्ली विश्वविद्यालय).

इनके अतिरिक्त, पर्यावरण वैज्ञानिक प्रो. जगदीश कृष्णास्वामी (IIHS) और प्रो. (डॉ.) लक्ष्मीकांत शर्मा (सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ हरियाणा) को कमेटी में विशेष आमंत्रित सदस्य (Special Invitees) के रूप में जोड़ा गया है. वहीं, भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के निदेशक स्तर के एक वरिष्ठ अधिकारी को इस पूरी समिति का सदस्य सचिव (Member Secretary) नियुक्त किया जाएगा.

केवल बंद कमरों में नहीं होगा फैसला; हितधारकों से मांगे जाएंगे सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने इस नई कमेटी को एक बेहद महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक निर्देश भी दिया है. कोर्ट ने कहा कि अरावली से जुड़े फैसले बंद कमरों की बजाय सार्वजनिक सहभागिता से होने चाहिए. इसके लिए कमेटी को उचित सार्वजनिक सूचना (Public Notice) जारी कर सभी प्रभावित वर्गों— जैसे पर्यावरणविदों, स्थानीय किसानों, खदान श्रमिकों और वहां की स्थानीय जनजातियों व समुदायों से लिखित सुझाव आमंत्रित करने होंगे, ताकि सभी पक्षों को निष्पक्षता से सुना जा सके.

अरावली मामले की पूरी टाइमलाइन (The Complete Timeline)

ऐतिहासिक तारीखसुप्रीम कोर्ट के कड़े विधिक कदम और आदेश
09 मई 2024सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अरावली पर्वतमाला मामले की प्रारंभिक जांच के लिए पहली समिति का गठन हुआ.
03 अक्टूबर 2025इस प्रारंभिक समिति ने महीनों की फील्ड जांच के बाद अपनी विस्तृत रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी.
20 नवंबर 2025सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट का अध्ययन कर अपना मुख्य फैसला सुनाया और कई ऐतिहासिक दिशा-निर्देश जारी किए.
29 दिसंबर 2025कोर्ट ने माना कि दिशा-निर्देश लागू करने से पहले एक पूरी तरह निष्पक्ष और स्वतंत्र ‘हाई-पावर विशेषज्ञ कमेटी’ का गठन होना अनिवार्य है.
26 फरवरी 2026सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से कमेटी के लिए संबंधित डोमेन विशेषज्ञों के नाम बंद लिफाफे में सुझाने को कहा.
25 मई 2026(वर्तमान आदेश): सुप्रीम कोर्ट ने आधिकारिक तौर पर इस 5 सदस्यीय शक्तिशाली हाई-पावर कमेटी के गठन पर अपनी अंतिम मुहर लगाई.
31 अगस्त 2026नवनियुक्त हाई-पावर एक्सपर्ट कमेटी को अपनी अंतिम वैज्ञानिक रिपोर्ट शीर्ष अदालत में जमा करने की अंतिम समय-सीमा दी गई है.
07 सितंबर 2026सुप्रीम कोर्ट में इस पूरे मामले पर अगली महा-सुनवाई की तारीख मुकर्रर की गई है.

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