सरकारी जमीनों पर कब्जे और भ्रष्टाचार के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं, लेकिन लाडपुरा तहसील में एक ऐसा ‘कारनामा’ उजागर हुआ है जिसने पूरे प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है। यहाँ के तहसीलदार राजवीर यादव पर आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग-27 (NH-27) पर स्थित पंचायत समिति की बेशकीमती 25 बीघा जमीन को गुपचुप तरीके से एक निजी व्यक्ति के नाम नामांतरित (म्यूटेशन) कर दिया। इस जमीन की वर्तमान बाजार कीमत लगभग 50 करोड़ रुपये आंकी जा रही है।
क्या है ज़मीन का इतिहास?
यह कोई आम जमीन नहीं है। यह जमीन पिछले 43 वर्षों से लाडपुरा पंचायत समिति के कब्जे में थी और मूल रूप से इस पर ‘मंदिर माफी’ (भगवान मथुराधीश) का अधिकार था।
- राज्य सरकार ने 24 फरवरी 1982 को यह जमीन पंचायत समिति को आवंटित करने की स्वीकृति दी थी।
- इसके एवज में पंचायत समिति ने बाकायदा 23 जून 1984 को 10 हजार रुपये और 27 मार्च 1985 को 30 हजार रुपये का चालान मथुराधीश मंदिर के कोष में जमा भी करवाया था।
ऐसे हुआ करोड़ों के घोटाले का पर्दाफाश इस गंभीर अनियमितता की भनक किसी को नहीं थी। इसका खुलासा 10 फरवरी 2026 को एक प्रशासनिक शिविर के दौरान तब हुआ, जब एक व्यक्ति ने अचानक इस ज़मीन पर अपना दावा पेश कर दिया। जब लाडपुरा के बीडीओ (BDO) शैलेश रंजन ने राजस्व रिकॉर्ड की गहन जांच करवाई, तो चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। पता चला कि तहसीलदार ने 10 मार्च 2025 को ही नामांतरण संख्या 1072 के जरिए यह बेशकीमती जमीन ‘राजन जॉन’ नामक व्यक्ति के नाम कर दी है।
विवादित जमीन का रिकॉर्ड:
- खसरा संख्या: 48/190, 52/1.15 और 53/0.68
- खाता संख्या: 265
- कुल रकबा: 3.73 हेक्टेयर (लगभग 25 बीघा)
- लोकेशन: NH-27 (प्राइम लोकेशन)
प्रशासनिक कार्रवाई और बीडीओ का कड़ा रुख
घोटाला सामने आते ही लाडपुरा बीडीओ शैलेश रंजन ने इस नामांतरण को पूरी तरह अवैध बताते हुए जिला कलेक्टर और जिला परिषद सीईओ को विस्तृत रिपोर्ट भेज दी है। इसके साथ ही, एसडीएम (SDM) कोर्ट में इस अवैध नामांतरण को तत्काल निरस्त करने के लिए वाद (Case) भी दायर कर दिया गया है।
“पंचायत समिति 43 साल से इस जमीन पर खेती कर रही है। तहसीलदार ने गलत तरीके से इसका नामांतरण किया है। हमने इसे निरस्त कराने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है।” > — शैलेश रंजन, बीडीओ, पंचायत समिति लाडपुरा
क्या कहते हैं आरोपी पक्ष?
जहाँ प्रशासन इस नामांतरण को अवैध मानकर कार्रवाई कर रहा है, वहीं तहसीलदार राजवीर यादव खुद का बचाव करते हुए कह रहे हैं कि उन्होंने सारा काम “नियमानुसार” किया है और जमीन संबंधित व्यक्ति के परिवार के नाम पहले से दर्ज थी। वहीं लाभार्थी राजन जॉन का दावा है कि उसके पास जमीन के पुख्ता दस्तावेज़ हैं।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस 50 करोड़ के जमीन घोटाले में तहसीलदार के खिलाफ क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई करता है।
