जयपुर। जयपुर नगर निगम (Jaipur Municipal Corporation) मुख्यालय में शुक्रवार को उस वक्त भारी हड़कंप मच गया, जब कोर्ट के आदेश पर एक टीम निगम कमिश्नर ओम कसेरा की कुर्सी कुर्क (Attach) करने पहुंच गई। यह हैरान कर देने वाली कार्रवाई 13 साल पुराने राजस्थान हाईकोर्ट के एक आदेश की पालना न किए जाने के कारण हुई है।
एससीजेएम-1 (ACJM-1) जयपुर महानगर प्रथम कोर्ट ने ‘चंद्रकांत नागर बनाम जेडीए और अन्य’ मामले में न्यायालय के आदेशों की घोर अवहेलना को गंभीरता से लेते हुए यह सख्त आदेश जारी किया है।
अचानक निगम मुख्यालय पहुंची टीम
शुक्रवार को जैसे ही कोर्ट के आदेश के बाद सेल अमीन बाबूलाल शर्मा, डिक्रीदार रश्मिकांत नागर और अधिवक्ता संजय शर्मा नगर निगम मुख्यालय पहुंचे, वहां का माहौल पूरी तरह बदल गया। यह टीम सीधे आयुक्त कार्यालय (Commissioner Office) पहुंची और कुर्सी कुर्क करने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी। एडवोकेट संजय शर्मा ने मौके पर आवश्यक दस्तावेजी कार्रवाई की। अचानक हुई इस अप्रत्याशित कार्रवाई से निगम के आला अधिकारियों और कर्मचारियों में भारी हलचल और बेचैनी देखने को मिली।
क्या है पूरा मामला? 13 साल से क्यों अटका था काम
इस पूरे विवाद और कुर्की की कार्रवाई की जड़ें साल 2013 से जुड़ी हुई हैं।
- मूल विवाद: परिवादी चंद्रकांत नागर ने जेडीए और नगर निगम के खिलाफ एक वाद दायर किया था।
- हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश: मामले की सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने 26 सितंबर 2013 को जयपुर नगर निगम को सख्त निर्देश दिए थे कि वह परिवादी को तुरंत भूखंड का ‘आवंटन पत्र’ (Allotment Letter) जारी करे।
- प्रशासनिक लापरवाही: आरोप है कि हाईकोर्ट के इतने स्पष्ट और सीधे आदेश के बावजूद, निगम प्रशासन ने इसे फाइलों में दबाए रखा। 13 साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी परिवादी को आवंटन पत्र जारी नहीं किया गया।
ACJM कोर्ट ने माना ‘न्यायालय की अवमानना’
जब 13 वर्षों तक लगातार उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना होती रही और परिवादी को न्याय नहीं मिला, तो मामला वापस निचली अदालत पहुंचा। ACJM-1 जयपुर महानगर प्रथम कोर्ट ने इस प्रशासनिक लेटलतीफी को बेहद गंभीरता से लिया।
कोर्ट ने माना कि इतने लंबे समय तक आदेशों की अनुपालना नहीं होना सीधे तौर पर ‘न्यायालय की अवमानना’ (Contempt of Court) के समान है। इसी के चलते अदालत ने हाल ही में 20 मई 2026 को कड़ा रुख अपनाते हुए नगर निगम कमिश्नर की कुर्सी कुर्क करने के आदेश जारी कर दिए।
प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
इस अभूतपूर्व कुर्की की कार्रवाई के बाद प्रशासनिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।
- अधिकारियों में मंथन: निगम मुख्यालय में अब यह सवाल गूंज रहा है कि आखिर इतने सालों तक किस अधिकारी के स्तर पर हाईकोर्ट के आदेश की अनदेखी की गई और फाइलों को क्यों अटका कर रखा गया।
- कानूनी राय की कवायद: कुर्की की टीम पहुंचने के बाद निगम प्रशासन अचानक नींद से जागा है और अब इस मामले को लेकर लीगल ओपिनियन (कानूनी राय) लेने और आगे की बचाव प्रक्रिया को लेकर सक्रिय नजर आ रहा है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत का यह कदम उन सभी सरकारी विभागों के लिए एक बहुत सख्त संदेश है, जो न्यायालय के आदेशों को हल्के में लेते हैं या लालफीताशाही के चलते आम जनता को न्याय मिलने में बेवजह की देरी करते हैं।