MVSI भर्ती विवाद: हाईकोर्ट ने कहा- नियमों में जहां सिर्फ डिप्लोमा तय, वहां डिग्री वाले स्वतः पात्र नहीं

Madhu Manjhi

जयपुर। राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर पीठ ने परिवहन उप निरीक्षक (Motor Vehicle Sub Inspector – MVSI) भर्ती को लेकर चल रहे विवाद पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि जिन भर्ती नियमों में योग्यता के तौर पर केवल ‘डिप्लोमा’ निर्धारित किया गया है, वहां उच्च शिक्षा यानी ‘डिग्री’ धारकों को स्वतः ही पात्र नहीं माना जा सकता।

इस अहम फैसले के साथ ही न्यायालय ने इस भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी सभी विशेष अपीलों को खारिज कर दिया है और राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह बिना किसी देरी के इस भर्ती प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करे।

खंडपीठ ने खारिज की सभी अपीलें

यह महत्वपूर्ण फैसला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting CJ) जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बिपिन गुप्ता की खंडपीठ ने सुनाया। MVSI भर्ती प्रक्रिया में डिग्री धारकों को शामिल करने की मांग को लेकर अदालत में कई विशेष अपीलें दायर की गई थीं। खंडपीठ ने इन सभी अपीलों पर विस्तार से सुनवाई करने के बाद उन्हें खारिज कर दिया और राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि कानूनी बाधाओं को दूर करते हुए योग्य अभ्यर्थियों की भर्ती प्रक्रिया शीघ्र पूर्ण की जाए।

फैसले के मुख्य बिंदु और कोर्ट की टिप्पणियां

अदालत ने अपने फैसले में भर्ती नियमों और योग्यताओं की तकनीकी बारीकियों को स्पष्ट करते हुए कई अहम टिप्पणियां कीं:

  • ‘न्यूनतम योग्यता’ (Minimum Qualification) शब्द का जिक्र नहीं: कोर्ट ने पाया कि भर्ती नियमों के शेड्यूल में परिवहन उप निरीक्षक पद के लिए कहीं भी ‘न्यूनतम योग्यता’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।
  • केवल डिप्लोमा ही मान्य: नियमों में बिल्कुल स्पष्ट रूप से ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग (Automobile Engineering) या मैकेनिकल इंजीनियरिंग (Mechanical Engineering) में ‘डिप्लोमा’ को ही पात्रता का आधार माना गया है।
  • समकक्षता का अधिकार सरकार के पास: अदालत ने कहा कि इसके अलावा केवल वही योग्यता मान्य हो सकती है, जिसे केंद्र या राज्य सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर समकक्ष (Equivalent) घोषित किया गया हो।

“अदालत नियमों में नई योग्यता नहीं जोड़ सकती”

खंडपीठ ने नियम बनाने वाले प्राधिकरण (Rule-making Authority) की मंशा को भी स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा:

  • नियम बनाने वाले प्राधिकरण ने जानबूझकर इस पद के लिए उच्च योग्यता या ‘डिग्री धारक’ (Degree Holder) जैसे शब्दों को शामिल नहीं किया है।
  • भर्ती समिति ने भी अपने स्तर पर विचार करते हुए डिप्लोमा और डिग्री को समान योग्यता नहीं माना है।

अदालत ने सख्त लहजे में स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को यह अधिकार नहीं है कि वह भर्ती नियमों को फिर से लिखे या उसमें कोई ऐसी नई पात्रता/योग्यता जोड़े, जो पहले से निर्धारित नियमों में मौजूद नहीं है।

इस फैसले से उन अभ्यर्थियों को बड़ा झटका लगा है जिन्होंने इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की है और वे इस भर्ती में अपनी दावेदारी पेश कर रहे थे। वहीं, डिप्लोमा धारकों के लिए यह फैसला एक बड़ी राहत लेकर आया है, क्योंकि अब उनके लिए भर्ती प्रक्रिया का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

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